टोंक में कल 70 KG का दड़ा करेगा झमाझम बारिश की भविष्यवाणी

टोंक/जयपुर.  टोंक जिले के आवां कस्बे में हर साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर मनाए जाने वाले दड़ा महोत्सव की तैयारियां इन दिनों जोरों पर हैं। राजपरिवार की ओर से आयोजित इस महोत्सव के लिए गढ़ पैलेस में दक्ष कारीगर पिछले 15 दिनों से दड़ा बनाने का कार्य कर रहे हैं। विश्व प्रसिद्ध इस महोत्सव के आयोजनकर्ता राजपरिवार की महारानी विजया देवी और कुंवर कार्तिकेय सिंह ने बताया कि इस वर्ष भी दड़ा महोत्सव का आयोजन परंपरागत धूमधाम से किया जाएगा। ऐसे होता है तैयार लकड़ी के बुरादे, बजरी और टाट से बना यह फुटबॉलनुमा दड़ा तकरीबन

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Published On :

जनवरी 13, 2026

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टोंक/जयपुर. 

टोंक जिले के आवां कस्बे में हर साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर मनाए जाने वाले दड़ा महोत्सव की तैयारियां इन दिनों जोरों पर हैं। राजपरिवार की ओर से आयोजित इस महोत्सव के लिए गढ़ पैलेस में दक्ष कारीगर पिछले 15 दिनों से दड़ा बनाने का कार्य कर रहे हैं।

विश्व प्रसिद्ध इस महोत्सव के आयोजनकर्ता राजपरिवार की महारानी विजया देवी और कुंवर कार्तिकेय सिंह ने बताया कि इस वर्ष भी दड़ा महोत्सव का आयोजन परंपरागत धूमधाम से किया जाएगा।

ऐसे होता है तैयार
लकड़ी के बुरादे, बजरी और टाट से बना यह फुटबॉलनुमा दड़ा तकरीबन 70 किलो वजन का होता है। इसे बनाने में 15 दिन की कड़ी मेहनत लगती है। तैयार होने के बाद इसे पानी में भिगोकर और अधिक मजबूत और सख्त बनाया जाता है। वर्तमान में आवां के विशेषज्ञ ग्रामीण इसकी तैयारी में जुटे हैं। युवा और बुजुर्गों में इसे लेकर खासा उत्साह है। रियासत काल से आवां कस्बे में दड़ा महोत्सव का आयोजन राजपरिवार की ओर से होता आ रहा है। परंपरागत रूप से खेले जाने वाला यह खेल मौजूदा फुटबॉल से मिलता-जुलता है, लेकिन इसमें खिलाड़ियों की संख्या हजारों में होती है। गांव के बीच स्थित गोपाल चौक में खेले जाने वाले इस खेल में दो गोल पोस्ट अखनियां दरवाजा और दूनी दरवाजा होते हैं, जिनकी दूरी लगभग एक किलोमीटर होती है।

दड़ा करता है भविष्यवाणी
करीब 20 गांवों के तीन हजार लोग इस खेल में भाग लेते हैं, जबकि दस हजार दर्शक मकानों की छतों और चौक में जमा होकर खेल का आनंद लेते हैं। मान्यता है कि यदि दड़ा दूनी दरवाजे की ओर जाता है तो वर्षा अच्छी होती है और साल सुकाल का माना जाता है, जबकि अखनियां दरवाजे की ओर जाने पर अकाल का संकेत माना जाता है।

सैनिकों की भर्ती से हुई थी शुरुआत
आवां के युवा सरपंच दिव्यांश महेंद्र भारद्वाज ने बताया कि राजस्थानी संस्कृति के प्रतीक इस अद्भुत खेल की शुरुआत एक शताब्दी पहले राव राजा सरदार सिंह ने सेना में वीर योद्धाओं की भर्ती के उद्देश्य से की थी। समय के साथ यह परंपरा महोत्सव के रूप में विकसित हो गई।

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