बस्तर लौटे 50 पूर्व माओवादी, गढ़चिरौली में साथियों ने नम आंखों से दी विदाई

जगदलपुर. कभी घने जंगलों में AK-47 जैसे आधुनिक हथियारों के साथ घूमने वाले, कभी एक-दूसरे के लिए जान लेने और जान देने को तैयार रहने वाले माओवादी, आज जब एक-दूसरे से बिछड़े, तो आंखों से आंसू नहीं रुके। तस्वीर ऐसी थी जिसे देखकर शायद कोई भी ठिठक जाए जो लोग कभी बंदूक के साए में जिंदगी जीते थे, आज सामान्य जिंदगी की ओर लौटते हुए एक-दूसरे को गले लगाकर रोते नजर आए। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के पुनर्वास का सिलसिला अब अगले चरण में पहुंच गया है। पिछले साल पूर्व माओवादी नेता वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति

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Published On :

सितम्बर 3, 2026

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जगदलपुर.

कभी घने जंगलों में AK-47 जैसे आधुनिक हथियारों के साथ घूमने वाले, कभी एक-दूसरे के लिए जान लेने और जान देने को तैयार रहने वाले माओवादी, आज जब एक-दूसरे से बिछड़े, तो आंखों से आंसू नहीं रुके। तस्वीर ऐसी थी जिसे देखकर शायद कोई भी ठिठक जाए जो लोग कभी बंदूक के साए में जिंदगी जीते थे, आज सामान्य जिंदगी की ओर लौटते हुए एक-दूसरे को गले लगाकर रोते नजर आए।

महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों के पुनर्वास का सिलसिला अब अगले चरण में पहुंच गया है। पिछले साल पूर्व माओवादी नेता वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति के नेतृत्व में बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया था। सुरक्षा कारणों से इन्हें गढ़चिरौली के पुलिस पुनर्वास केंद्र में रखा गया। यहां उनकी जिंदगी की दिशा बदलने की कोशिश की गई किसी को स्किल ट्रेनिंग दी गई, कई पूर्व माओवादियों के रिवर्स नसबंदी ऑपरेशन कराए गए और कुछ माओवादी जोड़ों ने नई जिंदगी की शुरुआत शादी के साथ की।

अब उसी पुनर्वास प्रक्रिया के तहत इन्हें धीरे-धीरे उनके मूल गांव और जिलों में वापस भेजा जा रहा है। पहले चरण में 50 पूर्व माओवादियों को गढ़चिरौली से बस्तर के अलग-अलग जिलों में उनके गृहग्राम के लिए रवाना किया गया। लेकिन विदाई के वक्त जो तस्वीर सामने आई, उसने पूरी कहानी का दूसरा चेहरा दिखा दिया। कभी जंगलों में हथियारों के साथ साथ चलने वाले ये लोग, अब एक-दूसरे से बिछड़ने के दर्द में गले मिलकर रो रहे थे।

हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया पर पूर्व माओवादी नेता जिनुगु नरसिम्हा रेड्डी उर्फ जम्पन्ना ने सवाल भी खड़े किए हैं। प्रेस नोट जारी कर जम्पन्ना ने कहा कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को लंबे समय तक पुनर्वास केंद्र में पुलिस निगरानी में रखने के बजाय, आत्मसमर्पण के बाद जल्द से जल्द उनके घर भेजा जाना चाहिए, ताकि वे सामान्य जिंदगी में वापस लौट सकें। कुल मिलाकर जंगल से शुरू हुआ सफर अब गांव की ओर लौट रहा है फर्क सिर्फ इतना है कि कभी इन हाथों में हथियार हुआ करते थे, लेकिन आज वही हाथ विदाई के वक्त एक-दूसरे को कसकर पकड़कर यह कह रहे थे, अब जिंदगी की लड़ाई बंदूक से नहीं, सामान्य जिंदगी जीकर लड़नी है।

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