Yashwant Varma News: कैश कांड में जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से झटका, समयसीमा बढ़ाने से इनकार

क्या इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही अब अंतिम दौर में है? सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति की वैधता को चुनौती देने वाली उनकी याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट ने जांच समिति के सामने जवाब दाखिल करने की समयसीमा बढ़ाने से भी साफ इनकार कर दिया। अब क्या होगा जस्टिस वर्मा का अगला कदम?

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Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 8, 2026

Yashwant Varma News: कैश कांड से जुड़े मामले में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने कमिटी के सामने पेश होने की समयसीमा बढ़ाने की उनकी मांग को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि जस्टिस वर्मा को 12 जनवरी को अनिवार्य रूप से उस समिति के सामने पेश होना होगा, जिसका गठन लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया है। इस आदेश से जस्टिस वर्मा की कानूनी स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है।

समिति के सामने पेशी पर कोई राहत नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा को अंतरिम राहत देने से साफ इनकार कर दिया। अदालत का कहना था कि फिलहाल समिति के सामने पेश होने से रोकने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया को इस स्तर पर बाधित नहीं किया जा सकता। ऐसे में जस्टिस वर्मा को तय समयसीमा के भीतर समिति के समक्ष उपस्थित होना ही होगा।

समिति की वैधता पर याचिका, फैसला सुरक्षित

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति की वैधता को चुनौती दी गई है। अदालत ने संकेत दिया कि इस मामले में संवैधानिक और प्रक्रियागत पहलुओं की गंभीरता से जांच की आवश्यकता है। हालांकि अंतिम निर्णय अभी लंबित है, लेकिन तब तक समिति की कार्यवाही जारी रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समिति के गठन में संभावित खामियों की ओर भी इशारा किया। जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला किसी दुर्भावना से प्रेरित प्रतीत नहीं होता, लेकिन कानून के स्तर पर दुर्भावना जैसी स्थिति जरूर दिखाई देती है। उन्होंने लोकसभा महासचिव की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाए और कहा कि कुछ जानकारियां पहले ही सार्वजनिक डोमेन में थीं, जिनकी अदालत पहले आलोचना कर चुकी है।

सार्वजनिक दस्तावेज और संवैधानिक प्रभाव

अदालत ने यह भी कहा कि जब किसी आदेश पर फैसला सुनाया जाता है, तो वह सार्वजनिक दस्तावेज बन जाता है। ऐसे मामलों में भविष्य के लिए अदालत को मार्गदर्शन देना पड़ सकता है। वहीं, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने लोकसभा अध्यक्ष का पक्ष रखते हुए दलील दी कि समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष ने अपने विशेष संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए किया है।

जस्टिस वर्मा की मुख्य आपत्तियां

जस्टिस यशवंत वर्मा ने तीन सदस्यीय समिति के गठन को सीधे तौर पर चुनौती दी है। उनका तर्क है कि Judges (Inquiry) Act, 1968 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में महाभियोग नोटिस दिए जाने के बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ने राज्यसभा सभापति से परामर्श किए बिना समिति का गठन कर दिया, जो कानून के खिलाफ है।

कानून का हवाला और संवैधानिक सवाल

याचिका में Judges (Inquiry) Act, 1968 की धारा 3(2) का हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, यदि दोनों सदनों में एक ही दिन महाभियोग प्रस्ताव पेश किए जाएं, तो समिति का गठन तभी किया जा सकता है जब दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार हो जाएं। ऐसी स्थिति में समिति का गठन लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति संयुक्त रूप से करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना है कि समिति के गठन में प्रक्रिया संबंधी खामी हो सकती है। हालांकि अदालत यह भी विचार कर रही है कि क्या यह खामी इतनी गंभीर है कि न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो। अब इस संवैधानिक और संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का इंतजार किया जा रहा है, जो आगे की दिशा तय करेगा।

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