West Bengal SIR : बंगाल SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार नहीं

पश्चिम बंगाल की विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में अहम टिप्पणियां सामने आईं। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का अधिकार क्षेत्र नहीं है। इस टिप्पणी के बाद मामले की कानूनी और राजनीतिक बहस और तेज हो गई।

West Bengal SIR

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जुलाई 17, 2026

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West Bengal SIR :  पश्चिम बंगाल में एसआईआर (SIR) विवाद पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी भी व्यक्ति की नागरिकता निर्धारित करना भारतीय चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है। कोर्ट ने साफ किया कि आयोग की शक्तियां केवल मतदाता सूची के नियंत्रण, विनियमन और पर्यवेक्षण तक ही सीमित हैं। कानून की स्थिति पर किसी भी प्रकार के भ्रम को खारिज करते हुए जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने कहा कि मतदाता सूची में नाम का न होना स्वतः ही किसी व्यक्ति की नागरिकता समाप्त नहीं कर देता। यदि कोई ट्रिब्यूनल किसी व्यक्ति का नाम सूची से बाहर करने का निर्णय लेता है, तो आयोग का दायित्व है कि वह नागरिकता निर्धारण के लिए उस मामले को संबंधित मंत्रालय के पास भेजे।

सरकारी योजनाओं से वंचित करने के आरोपों पर कोर्ट का संज्ञान

सुप्रीम कोर्ट ने उस याचिका पर सुनवाई करने के लिए अपनी सहमति प्रदान की है, जिसमें गंभीर आरोप लगाए गए हैं कि मतदाता सूची से नाम हटने के बाद लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), अन्नपूर्णा योजना और अन्य कल्याणकारी सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित किया जा रहा है। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण ने अदालत को बताया कि राज्य में 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों के काम करने के तरीके में विसंगतियां हैं, जिसके कारण मामलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी हो रही है। इन प्रशासनिक बाधाओं ने प्रभावित लोगों के जीवन को कठिन बना दिया है। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तारीख तय की है, जहाँ इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा होगी।

कल्याणकारी लाभों का अधिकार: अदालत का मानवीय दृष्टिकोण

इससे पूर्व बुधवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी राहत देते हुए कहा था कि जिन व्यक्तियों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, वे अभी भी सब्सिडी वाले राशन जैसे बुनियादी कल्याणकारी लाभों के हकदार हैं। हालांकि, राशन कार्ड निलंबन को चुनौती देने वाली याचिका पर कोर्ट ने सीधे हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। यह निलंबन पश्चिम बंगाल के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के जून आदेश के तहत हुआ था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इस विशिष्ट राहत के लिए कलकत्ता हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया। यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायिक प्रक्रिया में संवैधानिक अधिकार और मानवीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाना कितना आवश्यक है।

चुनाव आयोग की शक्तियों का दायरा: एक कानूनी विश्लेषण

चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया पहले भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में रही है। मई महीने में सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को बड़ी राहत प्रदान करते हुए उसकी एसआईआर करने की शक्ति को संवैधानिक रूप से सही ठहराया था। तब कोर्ट ने माना था कि बिहार में वोटर लिस्ट की एसआईआर प्रक्रिया का आदेश देकर आयोग ने ‘रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट’ (RP Act) का कोई उल्लंघन नहीं किया है। कोर्ट ने विभिन्न राज्यों में इस प्रक्रिया की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया था। इस बार की ताजा टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया है कि यद्यपि आयोग मतदाता सूची के प्रबंधन में सक्षम है, लेकिन उसे नागरिकता जैसे संवेदनशील और मौलिक विषयों पर कोई अंतिम निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार नहीं प्राप्त है।

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