West Bengal politics: पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार, 8 जून 2026 का दिन तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए एक बड़ा राजनीतिक भूचाल लेकर आया है। पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी जब दिल्ली में ‘इंडिया’ ब्लॉक की बैठक में भाजपा के खिलाफ एकजुटता दिखाने में व्यस्त थीं, ठीक उसी समय उनकी अपनी पार्टी में बगावत की चिंगारी एक बड़ी आग का रूप ले चुकी थी। टीएमसी के संसदीय दल के भीतर पनपा असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है, जिससे ममता बनर्जी के नेतृत्व पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
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बगावत का केंद्र बनीं सांसद शताब्दी रॉय का आवास
राजनीतिक हलचल का केंद्र तब बनीं टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय, जब उनके दिल्ली स्थित आवास पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री (विपक्षी नेता) शुभेंदु अधिकारी का पहुंचना चर्चा का विषय बन गया। इससे पहले सांसद जून मालिया का भी वहां पहुंचना इस बात का संकेत है कि पार्टी के भीतर एक समानांतर गुट सक्रिय हो गया है। हालांकि ममता बनर्जी ने नाराजगी दूर करने के लिए सांसदों के साथ बैठक की थी, लेकिन लगता है कि डैमेज कंट्रोल की कोशिशें नाकाम रही हैं।
सुखेंदु शेखर रॉय का इस्तीफा और ममता पर तीखे प्रहार
इस संकट के बीच टीएमसी को राज्यसभा में भी करारा झटका लगा। पार्टी के पूर्व मुख्य सचेतक सुखेंदु शेखर रॉय ने सांसद पद और पार्टी, दोनों से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने ममता बनर्जी और टीएमसी नेतृत्व पर तीखे प्रहार करते हुए कहा कि सत्ता के नशे में चूर पार्टी नेतृत्व अब जमीनी हकीकतों से पूरी तरह कट चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 15 सालों से सत्ता में बैठे नेताओं की पहुंच आम जनता से दूर हो गई है, जबकि जमीनी कार्यकर्ताओं को पूरी तरह उपेक्षित किया जा रहा है।
एनडीए को समर्थन का दावा
टीएमसी के भीतर के बागी गुट का नेतृत्व कर रहीं काकोली घोष दस्तीदार के एक दावे ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। उन्होंने दावा किया है कि टीएमसी के करीब 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर एनडीए को समर्थन देने की घोषणा की है। हालांकि टीएमसी नेता कीर्ति आजाद ने इन दावों को खारिज करते हुए इसे ‘धोखा’ और ‘फर्जी’ करार दिया है। टीएमसी का दावा है कि सचेतक पद पर काकोली घोष का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि ममता बनर्जी ने पहले ही कल्याण बनर्जी को यह जिम्मेदारी सौंप दी है।
पार्टी की गिरती साख और कुणाल घोष की निराशा
टीएमसी प्रवक्ता कुणाल घोष ने बागियों पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन लोगों ने ममता बनर्जी के नाम और चुनाव चिन्ह पर जीत हासिल की, आज वे अवसरवाद की राजनीति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह जनमत का अपमान है। टीएमसी के वर्तमान में 27 लोकसभा सांसद (एक सीट खाली) हैं। गणितीय दृष्टिकोण से यदि 20 सांसद एनडीए में जाने का प्रयास करते हैं, तो वे दलबदल विरोधी कानून की ‘दो-तिहाई’ की सीमा को पार कर लेंगे, जो ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
राज्य में पहले ही करीब 58 विधायकों के विद्रोह का सामना कर रही टीएमसी के लिए, दिल्ली में सांसदों का यह बागी रुख ममता बनर्जी की पार्टी पर कमजोर होती पकड़ को स्पष्ट दर्शाता है। आने वाले दिन बंगाल की सियासत में बड़े उलटफेर का संकेत दे रहे हैं।
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