Putin Gas Threat: मिडिल ईस्ट में ईरान और इजरायल के बीच छिड़े भीषण युद्ध ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल दिया है, बल्कि पूरी दुनिया को एक विनाशकारी ऊर्जा संकट के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस वैश्विक उथल-पुथल और तनावपूर्ण माहौल के बीच, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने एक ऐसी कूटनीतिक चाल चली है, जिसने यूरोपीय देशों के होश उड़ा दिए हैं। पुतिन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि रूस जल्द ही यूरोप को दी जाने वाली प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर पूरी तरह से रोक लगा सकता है। राष्ट्रपति पुतिन के इस एक बयान मात्र से ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हड़कंप मच गया है और यूरोपीय बाजारों में गैस की कीमतों में 50 फीसदी से अधिक का ऐतिहासिक उछाल देखा जा रहा है।
पुतिन की सोची-समझी रणनीति: ऊर्जा को बनाया हथियार
रूसी राष्ट्रपति ने हाल ही में सार्वजनिक मंच से यह कहकर आग में घी डालने का काम किया कि मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अब शायद वह समय आ गया है जब यूरोपीय देशों को की जाने वाली गैस सप्लाई को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाना चाहिए। हालांकि, पुतिन ने अपनी चिर-परिचित कूटनीतिक शैली में इसे केवल एक ‘विचार’ बताया और कहा कि फिलहाल कोई अंतिम आधिकारिक निर्णय नहीं लिया गया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ इसे रूस की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देख रहे हैं। पुतिन का तर्क है कि यूरोप एक तरफ रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाने की योजना बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ रूसी संसाधनों का लाभ भी उठाना चाहता है। रूस अब स्पष्ट कर चुका है कि उसके पास गैस निर्यात के लिए चीन और भारत जैसे नए और विशाल बाजार मौजूद हैं।
होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट और आसमान छूती कीमतें
यूरोप में गैस की कीमतों के बेकाबू होने के पीछे केवल पुतिन का बयान ही नहीं, बल्कि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में उपजा तनाव भी एक बड़ी वजह है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा व्यापार की जीवनरेखा है, जहाँ से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत एलएनजी (LNG) और कच्चे तेल का परिवहन होता है। ईरान-इजरायल युद्ध के कारण कतर ने इस सप्ताह अपनी एलएनजी सप्लाई को पूरी तरह से निलंबित कर दिया है। यह यूरोप के लिए एक बहुत बड़ा झटका है, क्योंकि कतर अकेले यूरोपीय संघ (EU) की लगभग 6 प्रतिशत गैस आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। स्थिति इस कदर बिगड़ चुकी है कि सोमवार को यूरोपीय गैस की कीमतें 48.66 यूरो प्रति मेगावाट घंटा के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गईं, जिससे यूरोपीय तेल और गैस समूहों को आपातकालीन बैठकें बुलानी पड़ी हैं।
रूसी गैस पर यूरोप की निर्भरता: एक कड़वा सच
यूक्रेन युद्ध की शुरुआत के बाद से ही यूरोपीय देशों ने रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाया है। सांख्यिकीय रूप से देखें तो नॉर्वे (30%) और अमेरिका (58% LNG) अब यूरोप के मुख्य सप्लायर बन चुके हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि यूरोप अब भी पूरी तरह से रूसी गैस से मुक्त नहीं हो पाया है। फ्रांस, स्पेन और बेल्जियम जैसे प्रमुख देश आज भी भारी मात्रा में रूस से एलएनजी का आयात कर रहे हैं। हालांकि यूरोपीय संघ ने जनवरी 2026 में एक नया कानून पारित कर 2027 के अंत तक रूसी गैस पर पूर्ण प्रतिबंध का लक्ष्य रखा है, लेकिन पुतिन की वर्तमान धमकी ने इस संक्रमण काल को अत्यंत जोखिम भरा बना दिया है।
बदलता वैश्विक समीकरण और यूरोप की बढ़ती बेबसी
पश्चिमी प्रतिबंधों की काट के रूप में रूस ने अपनी ऊर्जा नीति का रुख अब पूरी तरह से पूर्व (एशिया) की ओर मोड़ दिया है। व्लादिमीर पुतिन भली-भांति जानते हैं कि मिडिल ईस्ट में मचे घमासान के कारण वर्तमान में ऊर्जा के विकल्प अत्यंत सीमित हैं। यदि इस नाजुक मोड़ पर रूस ने गैस की पाइपलाइन काट दी, तो यूरोप के पास तत्काल कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होगी। गैस सप्लाई रुकने का सीधा प्रभाव यूरोप की औद्योगिक उत्पादन क्षमता और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जिससे वहां का पूरा सामाजिक-आर्थिक तंत्र ठप होने की कगार पर पहुँच सकता है।










