Vat Savitri Vrat 2026: बरगद की पूजा में कहीं आप भी तो नहीं कर रहीं ये गलती? जानें सूत बांधने का सही नियम

हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत सुहागिनों के लिए अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का प्रतीक है। इस पावन अवसर पर वट वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है, लेकिन व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए पूजा के नियमों का सही पालन करना अनिवार्य है।

Vat Savitri Vrat 2026

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

मई 7, 2026

Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन और पति की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन माता सावित्री के त्याग और तपस्या को याद किया जाता है, जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। वर्ष 2026 में यह पवित्र व्रत 16 मई को रखा जाएगा। इस दिन महिलाएं वट यानी बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं और विधि-विधान से व्रत का पालन करती हैं।

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वट वृक्ष की पूजा करते समय न करें ये गलतियां

वट सावित्री व्रत के दिन बरगद के पेड़ की पूजा करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना जरूरी होता है। छोटी-सी गलती भी व्रत के फल को प्रभावित कर सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वट वृक्ष पर सूत (कच्चा धागा) कभी भी गलत दिशा में नहीं बांधना चाहिए। इसे उल्टी दिशा में बांधना अशुभ माना जाता है। इसके अलावा वट वृक्ष की परिक्रमा अधूरी नहीं छोड़नी चाहिए, बल्कि पूरी श्रद्धा और नियम के साथ पूरी परिक्रमा करनी चाहिए। पूजा के दौरान जल्दबाजी या असावधानी भी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह व्रत श्रद्धा और नियमों का प्रतीक है।

सूत बांधने का सही तरीका क्या है?

वट सावित्री व्रत में सूत बांधने की परंपरा का विशेष महत्व होता है। इसे सही तरीके से करना आवश्यक माना गया है। सूत को हमेशा दक्षिणावर्त दिशा यानी दाएं से बाएं घुमाते हुए बांधना चाहिए। महिलाओं को वट वृक्ष की परिक्रमा करते हुए हर चक्कर में प्रार्थना करनी चाहिए और अपने पति की लंबी उम्र तथा सुख-समृद्धि की कामना करनी चाहिए। सूत बांधने के बाद अंत में मन ही मन भगवान से अपने वैवाहिक जीवन की खुशहाली के लिए आशीर्वाद मांगना चाहिए।

वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

इस दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ एवं पारंपरिक वस्त्र पहनती हैं। इसके बाद सोलह श्रृंगार करना शुभ माना जाता है। पूजा के लिए बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज, फल, फूल, धूप, दीप और सावित्री-सत्यवान की प्रतिमा रखी जाती है। सबसे पहले वट वृक्ष की जड़ में जल अर्पित किया जाता है।

इसके बाद वृक्ष को रोली, अक्षत, भीगे हुए चने और गुड़ का भोग लगाया जाता है। महिलाएं हाथ में चने लेकर सावित्री और सत्यवान की कथा सुनती या पढ़ती हैं और व्रत की पूर्णता की कामना करती हैं।

वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत पत्नी के प्रेम, समर्पण और शक्ति का प्रतीक है। सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और भक्ति से अपने पति के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। इसी कारण यह व्रत वैवाहिक जीवन की मजबूती, पति की लंबी आयु और पारिवारिक सुख-समृद्धि के लिए बहुत शुभ माना जाता है। यह व्रत हर साल श्रद्धा और नियमों के साथ मनाया जाता है और सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां पौराणिक कथाओं,धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। खबर में दी जानकारी पर विश्वास व्यक्ति की अपनी सूझ-बूझ और विवेक पर निर्भर करता है। प्राइम टीवी इंडिया इस पर दावा नहीं करता है ना ही किसी बात पर सत्यता का प्रमाण देता है।