Vande Mataram Controversy: वंदे मातरम् अनिवार्य करने के निर्देश पर सियासी घमासान, मुस्लिम संगठनों का विरोध

देश में एक बार फिर वंदे मातरम् को लेकर सियासी पारा चढ़ गया है। सरकारी निर्देश के बाद मुस्लिम संगठनों ने इसे अपनी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ बताते हुए कड़ा विरोध शुरू कर दिया है। क्या यह फैसला सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ेगा या राष्ट्रवाद की नई परिभाषा लिखेगा? जानिए इस विवाद का पूरा सच!

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 12, 2026

Vande Mataram Controversy: केंद्र की मोदी सरकार ने बुधवार, 11 फरवरी को वंदे मातरम् को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों के अनुसार अब सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों, कॉलेजों और कई अन्य महत्वपूर्ण आयोजनों में वंदे मातरम् का गायन या वादन अनिवार्य होगा। साथ ही, इसे बजाए जाने के दौरान सभी उपस्थित लोगों को खड़े होकर सम्मान देना होगा, ठीक उसी प्रकार जैसे राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समय किया जाता है। सरकार के इस फैसले के बाद देश की राजनीति में एक बार फिर बहस तेज हो गई है।

फैसले के बाद शुरू हुई राजनीतिक बहस

सरकार के निर्देश सामने आते ही विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। खासकर मुस्लिम संगठनों और नेताओं ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इस तरह के आदेश से धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है। विपक्षी दलों के कुछ नेताओं ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं और इसे अनावश्यक विवाद खड़ा करने वाला कदम बताया है।

अरशद मदनी का कड़ा बयान

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने गुरुवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट कर सरकार के फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में सभी सरकारी कार्यक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों में पूरी तरह अनिवार्य करना एकतरफा और जबरन थोपा गया निर्णय है। मदनी के अनुसार यह कदम संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा आघात है और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सीमित करने का प्रयास प्रतीत होता है।

धार्मिक आस्था से जुड़ा आपत्ति का आधार

मदनी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि मुसलमान किसी को वंदे मातरम् गाने या उसकी धुन बजाने से नहीं रोकते। हालांकि, उनका तर्क है कि इस गीत की कुछ पंक्तियां बहुदेववादी विचारधारा से जुड़ी हैं और मातृभूमि को देवी स्वरूप में प्रस्तुत करती हैं। उनका कहना है कि इस प्रकार की अभिव्यक्ति इस्लाम की एकेश्वरवादी आस्था से मेल नहीं खाती। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 और सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध कुछ करने के लिए बाध्य करना असंवैधानिक है।

‘देशप्रेम थोपने से नहीं आता’

सरकार पर निशाना साधते हुए मदनी ने कहा कि देशभक्ति किसी पर थोपने से नहीं आती, बल्कि यह व्यक्ति के चरित्र, आचरण और त्याग से प्रकट होती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के फैसले चुनावी राजनीति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से प्रेरित हो सकते हैं। उनके अनुसार देश के सामने कई गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है, न कि ऐसे मुद्दों पर विवाद खड़ा करने की।

धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की चर्चा

मदनी ने आगे कहा कि मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और उसके साथ किसी को साझेदार ठहराना उसकी आस्था के विरुद्ध है। उन्होंने दोहराया कि वंदे मातरम् को अनिवार्य करना संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। उनका कहना है कि ऐसे निर्णय देश की सामाजिक सद्भावना और एकता को प्रभावित कर सकते हैं।

बहस के बीच सरकार का पक्ष

हालांकि सरकार की ओर से कहा गया है कि वंदे मातरम् राष्ट्रीय सम्मान और देशभक्ति का प्रतीक है, और इसका उद्देश्य नागरिकों में राष्ट्रप्रेम की भावना को सुदृढ़ करना है। अब देखना होगा कि इस मुद्दे पर आगे क्या राजनीतिक और कानूनी घटनाक्रम सामने आते हैं। फिलहाल, यह विषय राष्ट्रीय स्तर पर बहस और चर्चा का केंद्र बना हुआ है।