Vaccine Diplomacy: IIT मद्रास में जयशंकर बोले- वैक्सीन कूटनीति, पड़ोसी नीति और भारत की सभ्यतागत भूमिका

क्या भारत अब दुनिया का नया 'विश्व बंधु' बन चुका है? आईआईटी मद्रास के मंच से विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भारत की उस अदृश्य शक्ति का खुलासा किया जिसने संकट के समय दुनिया को बचाया। वैक्सीन कूटनीति से लेकर पड़ोसियों के साथ नए समीकरणों तक, जानिए जयशंकर की मास्टरक्लास!

Vaccine Diplomacy

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 2, 2026

Vaccine Diplomacy:  विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने शुक्रवार को IIT मद्रास में छात्रों को संबोधित करते हुए भारत की भूमिका को वैश्विक संदर्भ में विस्तार से समझाया। अपने व्याख्यान में उन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता, लोकतंत्र की अवधारणा, विदेश नीति, कोविड वैक्सीन कूटनीति और पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों पर खुलकर विचार रखे। छात्रों के सवालों के जवाब देते हुए उन्होंने भारत की जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में छवि को रेखांकित किया।

Vaccine Diplomacy: कोविड काल और वैक्सीन कूटनीति का अनुभव

कोविड-19 महामारी के दौर को याद करते हुए जयशंकर ने कहा कि अपने पूरे राजनयिक करियर में उन्होंने वैक्सीन वितरण जैसा भावनात्मक प्रभाव कभी नहीं देखा। उन्होंने बताया कि कई देशों में लोग आज भी भारत से मिली पहली वैक्सीन खेप को याद कर भावुक हो जाते हैं। उनके अनुसार, कोविड एक कठिन समय था, लेकिन भारत ने सामूहिक प्रयास से उस संकट को पीछे छोड़ा।

Vaccine Diplomacy: विकसित देशों और भारत के दृष्टिकोण में अंतर

जयशंकर ने पश्चिमी विकसित देशों की वैक्सीन नीति की तुलना भारत के रुख से की। उन्होंने कहा कि उस समय कई समृद्ध देशों ने अपनी जरूरत से आठ गुना अधिक वैक्सीन जमा कर ली थीं, जबकि छोटे और गरीब देशों को दस हजार डोज तक देने से इनकार किया जा रहा था। इसके विपरीत भारत ने 1.4 अरब लोगों की जिम्मेदारी निभाते हुए भी छोटे देशों को 1–2 लाख डोज देकर वैश्विक एकजुटता का परिचय दिया।

छोटे देशों के लिए भारत की भूमिका

विदेश मंत्री ने बताया कि आज लैटिन अमेरिका, कैरेबियन और प्रशांत क्षेत्र के छोटे द्वीपीय देशों के लोग खुले तौर पर स्वीकार करते हैं कि अगर भारत मदद न करता, तो उन्हें वैक्सीन तक उपलब्ध नहीं होती। उन्होंने यह भी माना कि वैक्सीन निर्माण की सप्लाई चेन भारत के बाहर से भी आई, लेकिन वैश्विक सहयोग और जिम्मेदारी के बिना यह संभव नहीं था।

पड़ोसी देशों के साथ भारत की नीति

बांग्लादेश की मौजूदा स्थिति और भारत की पड़ोसी नीति पर सवाल के जवाब में जयशंकर ने कहा कि भारत के पड़ोसी विविध परिस्थितियों में हैं। उन्होंने हाल ही में बांग्लादेश यात्रा और पूर्व प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जो पड़ोसी देश भारत को नुकसान नहीं पहुंचाते, उनके प्रति भारत का स्वभाव मदद और सहयोग का रहता है।

संकट में भी पड़ोसियों की मदद

जयशंकर ने श्रीलंका का उदाहरण देते हुए बताया कि जब वहां गंभीर आर्थिक संकट था, तब भारत ने 4 अरब डॉलर की सहायता दी, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से समझौता धीमी गति से चल रहा था। उन्होंने कहा कि अधिकतर पड़ोसी देश समझते हैं कि भारत की प्रगति एक “उठती लहर” की तरह है, जिससे पूरे क्षेत्र को लाभ होता है।

प्राचीन सभ्यता और आधुनिक लोकतंत्र

विदेश मंत्री ने भारत को दुनिया की उन गिनी-चुनी प्राचीन सभ्यताओं में से एक बताया, जो आज भी एक आधुनिक और मजबूत राष्ट्र के रूप में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को अपनाकर भारत ने इसे एक सार्वभौमिक विचार बना दिया। अगर भारत लोकतंत्र नहीं चुनता, तो यह अवधारणा केवल कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह जाती।

‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का वैश्विक संदेश

अपने संबोधन के अंत में जयशंकर ने कहा कि भारत की सोच कभी दुनिया को दुश्मन के रूप में देखने की नहीं रही। “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना के साथ भारत मित्रतापूर्ण साझेदारी के जरिए दुनिया को बेहतर बनाने में विश्वास करता है, जिसमें पश्चिमी देशों के साथ सहयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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