
Uttarakhand News: उत्तराखंड में ली कलाकारों जुड़े प्रशासनिक नियमों को लेकर उठे विवाद के बीच सीएम पुष्कर सिंह धामी ने अधिकारियों को प्रस्तावित नए नियम वापस लेने और पहले की केंद्रीकृत व्यवस्था बहाल करने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने लोक कलाकार संरक्षण संघ के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर उनकी समस्याएं सुनीं। कलाकारों का कहना है कि नई व्यवस्था से उनके कार्यक्रमों के आवंटन और भुगतान संबंधी कामकाज में परेशानी बढ़ सकती थी। हालांकि, फैसले को लागू करने वाला औपचारिक लिखित आदेश अभी जारी होना बाकी है।
Uttarakhand News: उत्तराखंड में धामी सरकार की सौगात, शिक्षा, सड़क और
नए प्रशासनिक ढांचे को लेकर क्यों हुआ विरोध?
प्रस्तावित बदलावों के तहत उत्तराखंड को अल्मोड़ा और गढ़वाल, दो मंडलों में बांटकर कार्यक्रमों के आवंटन और स्थानीय स्तर पर बिलों की प्रक्रिया संचालित करने की योजना थी। इसके साथ ही इन प्रशासनिक कार्यों को भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय की स्थानीय इकाइयों को सौंपने का प्रस्ताव भी शामिल था।
लोक कलाकारों के संगठनों ने इस व्यवस्था पर आपत्ति जताई। उनका कहना है कि संगीत की शिक्षा और प्रशिक्षण पर केंद्रित संस्थान पर प्रशासनिक जिम्मेदारियां डालने के बजाय कलाकारों के लिए पहले से चल रही केंद्रीकृत व्यवस्था जारी रहनी चाहिए। कलाकारों के मुताबिक, सरल और एकीकृत प्रक्रिया से कार्यक्रमों का आवंटन तथा भुगतान संबंधी कामकाज सुचारु रह सकता है।
जीएसटी से लेकर यात्रा पास तक कई मांगें
लोक कलाकार संरक्षण संघ ने मुख्यमंत्री के सामने अपनी मांगों का एक विस्तृत चार्टर रखा। इसमें कलाकारों की कमाई पर लगने वाले 12 प्रतिशत जीएसटी को पूरी तरह वापस लेने की मांग शामिल है। इसके अलावा कलाकारों के यात्रा पास बहाल करने, सरकारी गेस्ट हाउस में रियायती दरों पर ठहरने की सुविधा देने और मान्यता प्राप्त सांस्कृतिक समूहों को आधिकारिक पहचान पत्र जारी करने की मांग भी उठाई गई।
संघ ने कहा कि कलाकारों से जुड़ी नीतियों में अचानक बदलाव से बचने के लिए स्पष्ट सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए। इसके साथ ही अनुभवी और वरिष्ठ कलाकारों को उचित पहचान देने तथा सरकार की ओर से आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कम से कम 80 प्रतिशत स्थानीय कलाकारों की भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
कम मानदेय से लोक कलाकारों की आजीविका पर असर

लोक कलाकार संरक्षण संघ के अध्यक्ष जितेंद्र बलोनी ने कलाकारों की आर्थिक स्थिति का मुद्दा उठाया। उनके मुताबिक, कम और अनियमित मानदेय के कारण पारंपरिक कलाकारों के लिए रोजमर्रा के खर्च पूरे करना भी मुश्किल होता जा रहा है। बलोनी ने बताया कि कभी-कभी किसी कलाकार को तीन से चार महीने में केवल एक कार्यक्रम मिलता है और इसके लिए महज 800 रुपये का भुगतान किया जाता है। इतनी कम कमाई में घर का किराया देना, बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना और कार्यक्रमों के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों तक यात्रा करना बेहद कठिन हो जाता है।
सरकारी कार्यक्रमों में स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की मांग
संघ के अध्यक्ष ने उचित पारिश्रमिक और संसाधनों के न्यायसंगत वितरण पर जोर दिया। उनका कहना है कि सरकारी आयोजनों पर खर्च होने वाली सार्वजनिक धनराशि का लाभ स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता के आधार पर मिलना चाहिए। कलाकारों की मांग है कि सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थानीय समूहों को पर्याप्त अवसर दिए जाएं और भुगतान की व्यवस्था भी पारदर्शी हो।
लिखित आदेश जारी होने का इंतजार
मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद उत्तराखंड के लोक कलाकारों को प्रस्तावित प्रशासनिक बदलावों से राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि, नई व्यवस्था को वापस लेने और पुरानी प्रणाली बहाल करने से संबंधित औपचारिक आदेश जारी होने के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होगी। लोक कलाकार संरक्षण संघ को उम्मीद है कि सरकार के हस्तक्षेप से राज्य के हजारों पारंपरिक कलाकारों को राहत मिलेगी और उनकी लंबित मांगों पर भी आगे कार्रवाई होगी।











