US-UK Tension: ब्रिटेन की कीयर स्टार्मर सरकार और अमेरिकी प्रशासन के बीच ईरान संकट को लेकर दरार पैदा हो गई है। ब्रिटेन ने अपनी संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला देते हुए अमेरिका को सैन्य ठिकानों के उपयोग की अनुमति देने से मना कर दिया है।
ब्रिटेन का कड़ा रुख: अमेरिकी अनुरोध को किया खारिज
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने एक साहसी लेकिन जोखिम भरा कूटनीतिक फैसला लिया है। ब्रिटिश सरकार ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाई के लिए रॉयल एयर फोर्स (RAF) के ठिकानों का उपयोग करने के अमेरिकी प्रस्ताव को पूरी तरह ठुकरा दिया है। लंदन का मानना है कि वर्तमान परिस्थितियों में किसी भी सैन्य हमले का हिस्सा बनना उनकी विदेश नीति के सिद्धांतों के विरुद्ध है। इस निर्णय ने न केवल वाशिंगटन को चौंका दिया है, बल्कि दोनों देशों के बीच दशकों पुराने “विशेष संबंधों” पर भी सवालिया निशान लगा दिए हैं।
सामरिक ठिकानों पर ताला: फैयरफोर्ड और डियेगो गार्सिया का मुद्दा
ब्रिटेन ने स्पष्ट रूप से ग्लॉस्टरशायर स्थित आरएएफ फैयरफोर्ड और हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक द्वीप डियेगो गार्सिया को हमले के लिए इस्तेमाल करने से रोक दिया है। ब्रिटिश अधिकारियों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी भी देश पर बिना किसी ठोस कानूनी आधार के हमला करना गलत है। डियेगो गार्सिया एक ऐसा स्थान है जहाँ से अमेरिका मध्य पूर्व और एशिया पर नजर रखता है। ब्रिटेन का कहना है कि इन ठिकानों का उपयोग केवल रक्षात्मक कार्यों के लिए किया जा सकता है, न कि आक्रामक हमलों के लिए, जब तक कि वह अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुकूल न हो।
डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा: “यह एक रणनीतिक भूल है”
इस फैसले पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से कीयर स्टार्मर की आलोचना करते हुए इसे एक “बड़ी रणनीतिक भूल” करार दिया है। ट्रंप का तर्क है कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी दुनिया के लिए खतरा है और डियेगो गार्सिया जैसे महत्वपूर्ण बेस के बिना इस खतरे को रोकना मुश्किल होगा। उन्होंने संकेत दिया कि यदि ब्रिटेन इसी तरह असहयोग करता रहा, तो भविष्य में सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों के बीच दूरियाँ बढ़ सकती हैं।
चागोस द्वीप समझौता: 35 बिलियन पाउंड का दांव
इस विवाद का सीधा असर चागोस द्वीप समूह के भविष्य पर पड़ने वाला है। ब्रिटेन इस समय मॉरीशस के साथ एक समझौता करने की प्रक्रिया में है, जिसके तहत वह इन द्वीपों की संप्रभुता मॉरीशस को सौंप देगा, लेकिन डियेगो गार्सिया को 99 साल के लिए लीज पर अपने पास रखेगा। इस सौदे की कीमत लगभग 35 बिलियन पाउंड आंकी गई है। ट्रंप पहले ही इस सौदे को गलत बता चुके हैं। अब एयरबेस के उपयोग से इनकार करने के बाद, अमेरिका इस समझौते को प्रभावित करने या इसमें अड़चन डालने की कोशिश कर सकता है।
कानूनी पेच और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का भविष्य
मौजूदा संधियों के अनुसार, डियेगो गार्सिया से किसी भी मिशन के लिए अमेरिका को केवल ब्रिटेन को ‘सूचित’ करना होता है, लेकिन अन्य ब्रिटिश मुख्य भूमि के बेस के लिए ‘स्पष्ट अनुमति’ की आवश्यकता होती है। स्टार्मर सरकार ने इस कानूनी बारीकी का उपयोग करते हुए अमेरिका के हाथ बांध दिए हैं। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नाटो सहयोगी देश इस तनाव को कम कर पाएंगे या मिडिल ईस्ट का यह संकट पश्चिमी देशों के बीच एक स्थायी दरार पैदा कर देगा। ब्रिटेन की इस ‘कठोर नीति’ ने यह साफ कर दिया है कि वह अब वाशिंगटन की हर बात पर आंख बंद करके मुहर नहीं लगाएगा।
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