US Iran tension: मध्य पूर्व एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन द्वारा ईरान पर संभावित सैन्य हमले के संकेतों और क्षेत्र में अमेरिकी सेना की बढ़ती सक्रियता ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। विशेष रूप से अरब और मुस्लिम देशों में इस हलचल को लेकर गहरी बेचैनी है। सऊदी अरब, तुर्की, ओमान और कतर जैसे प्रमुख देश इस समय वाशिंगटन और तेहरान, दोनों के साथ निरंतर संपर्क बनाए हुए हैं। इन देशों का स्पष्ट मानना है कि यदि स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई, तो इसका विनाशकारी प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजारों की नींव हिला देगा।
कूटनीतिक मध्यस्थता की कोशिशें: तेल और गैस सप्लाई पर मंडराता खतरा
अरब राजनयिकों के अनुसार, खाड़ी देशों को सबसे बड़ा डर ‘जवाबी कार्रवाई’ का है। यदि अमेरिका ईरान पर हमला करता है, तो ईरान अपनी रक्षा में उन पड़ोसी देशों को निशाना बना सकता है जहाँ अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। इससे वे देश भी युद्ध की आग में झुलस सकते हैं जो सीधे तौर पर इस विवाद का हिस्सा नहीं हैं। इसके अलावा, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों के बाधित होने से कच्चे तेल की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है, जो वैश्विक मंदी का कारण बन सकती है। इसी तनाव के बीच सऊदी अरब के रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने वाशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की हैं।
ट्रंप की बदलती रणनीति: मानवाधिकारों से लेकर परमाणु कार्यक्रम तक का तर्क
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने इस विवाद को और भी पेचीदा बना दिया है। पहले उन्होंने ईरान में प्रदर्शनकारियों पर हो रहे अत्याचारों को सैन्य कार्रवाई का आधार बताया था, लेकिन अब उनका पूरा ध्यान ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने पर केंद्रित हो गया है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ईरान का परमाणु प्रसार इजरायल और पूरे क्षेत्र के लिए अस्तित्व का खतरा है। दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप एक तरफ सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ यह भी कह रहे हैं कि वे युद्ध नहीं चाहते और एक नए ‘समझौते’ के लिए तैयार हैं। हालांकि, उन्होंने किसी समय सीमा (Deadline) का खुलासा नहीं किया है, जिससे अनिश्चितता और बढ़ गई है।
ईरान का सख्त रुख: “धमकी के साये में नहीं होगी कोई बातचीत”
ईरान की ओर से भी जवाबी बयानबाजी तेज हो गई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने दोटूक शब्दों में कहा है कि उनका देश शांति का पक्षधर है, लेकिन किसी भी प्रकार के हमले की स्थिति में युद्ध के लिए भी पूरी तरह तैयार है। तेहरान ने साफ कर दिया है कि वे दबाव या धमकी के साये में अमेरिका के साथ किसी भी मेज पर नहीं बैठेंगे। ईरान का मानना है कि अमेरिका उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रहा है और परमाणु कार्यक्रम का मुद्दा केवल एक बहाना है।
तुर्की की मध्यस्थता और शांति की उम्मीद: एर्दोगन बने उम्मीद की किरण
तनाव के इस दौर में तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश की है। तुर्की का मानना है कि बातचीत ही एकमात्र रास्ता है जिससे इस संकट को टाला जा सकता है। ओमान और कतर भी कूटनीतिक गलियारों में ‘बैक-चैनल’ वार्ताओं के जरिए दोनों महाशक्तियों के बीच की खाई को पाटने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले कुछ सप्ताह अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं, क्योंकि ट्रंप प्रशासन का अगला कदम यह तय करेगा कि दुनिया एक और विनाशकारी युद्ध की ओर बढ़ेगी या कूटनीति की जीत होगी।
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