UP Vidhansabha Chunav 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू होते ही राजनीतिक दलों ने उस वोट बैंक पर फोकस बढ़ा दिया है, जो आने वाले चुनाव में कई सीटों का समीकरण बदल सकता है. यह वोट बैंक है Gen-Z यानी युवा मतदाता. करीब 15 फीसदी हिस्सेदारी वाले इस वर्ग को साधने के लिए बीजेपी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत तमाम दल रणनीति बनाने में जुटे हैं. सवाल यह है कि क्या पहली बार वोट डालने वाले युवा पारंपरिक जातीय और राजनीतिक समीकरणों से अलग जाकर अपना फैसला सुनाएंगे?
यूपी की चुनावी राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां वोट प्रतिशत में मामूली बदलाव भी सीटों के नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है. ऐसे में अगर Gen-Z मतदाताओं का रुख किसी एक राजनीतिक दल या गठबंधन की ओर निर्णायक रूप से जाता है, तो 2027 के चुनाव में इसका सीधा असर सीटों के गणित पर दिखाई दे सकता है. रोजगार, शिक्षा, महंगाई, डिजिटल अवसर, विकास और बेहतर भविष्य जैसे मुद्दे इस युवा वर्ग की प्राथमिकताओं में शामिल माने जा रहे हैं.
Gen-Z वोटर क्यों है सभी दलों के लिए खास?

राजनीतिक दलों का मानना है कि, पहली बार मतदान करने वाले और युवा मतदाता कई पारंपरिक चुनावी मुद्दों से अलग अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर फैसला ले सकते हैं. रोजगार के अवसर, बेहतर शिक्षा, डिजिटल सुविधाएं, महंगाई से राहत, विकास और सुरक्षित भविष्य जैसे मुद्दे इस वर्ग को प्रभावित कर सकते हैं.
दरियाबाद पर सबकी नजरें टिक गई

आज बात करते है हम, लखनऊ और धर्मनगरी अयोध्या के बीच स्थित बाराबंकी जिले की दरियाबाद विधानसभा सीट प्रदेश की उन सीटों में शामिल है, जहां इतिहास, राजनीति, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दे एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं. विधानसभा क्षेत्र संख्या 270 वाली यह सीट अयोध्या लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है और गोंडा व अयोध्या जिले की सीमाओं से सटी हुई है. 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ने के साथ एक बार फिर दरियाबाद पर सबकी नजरें टिक गई हैं.
दरियाबाद की राजनीतिक पहचान सिर्फ चुनावी आंकड़ों तक सीमित नहीं है. यह वही क्षेत्र है जहां से पूर्व केंद्रीय मंत्री और दिग्गज समाजवादी नेता बेनी प्रसाद वर्मा ने पहली बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी. इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई. लंबे समय तक इस सीट पर कांग्रेस और समाजवादी विचारधारा का प्रभाव रहा, लेकिन समय के साथ भाजपा ने भी यहां अपनी मजबूत पकड़ बनाई.
दरियाबाद का इतिहास भी है बेहद दिलचस्प
आज जिस क्षेत्र को बाराबंकी के नाम से जाना जाता है, उसका पुराना संबंध दरियाबाद से रहा है. स्थानीय इतिहास के मुताबिक अवध के वायसराय दरियाब खान ने वर्ष 1444 में इस क्षेत्र को बसाया था. उस समय इलाके में भाड़ जनजाति का प्रभाव और आतंक बताया जाता है. दरियाब खान ने इस क्षेत्र को उनके प्रभाव से मुक्त कराया और इसके बाद इलाके का नाम दरियाबाद पड़ा.
1858 तक दरियाबाद जिला मुख्यालय रहा. इसके बाद 1859 में जिला मुख्यालय को नवाबगंज स्थानांतरित कर दिया गया, जिसे बाद में बाराबंकी के नाम से जाना जाने लगा. इस तरह दरियाबाद का इतिहास मौजूदा बाराबंकी जिले के प्रशासनिक इतिहास से भी गहराई से जुड़ा हुआ है.
चार लाख से ज्यादा मतदाता, OBC-दलित समीकरण अहम
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दरियाबाद विधानसभा में कुल 4,02,383 मतदाता हैं. इनमें करीब 2,13,208 पुरुष, 1,89,163 महिला और 12 थर्ड जेंडर मतदाता शामिल हैं. अगर जातीय समीकरण की बात करें तो यहां दलित और ओबीसी मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण मानी जाती है. इसके बाद ब्राह्मण, मुस्लिम और ठाकुर मतदाताओं की भूमिका भी चुनावी परिणाम को प्रभावित करती रही है. यही वजह है कि दरियाबाद में राजनीतिक दलों की रणनीति में जातीय समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण स्थान रखता है.
बेनी प्रसाद वर्मा ने यहीं से शुरू की थी सियासी पारी

दरियाबाद की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय बेनी प्रसाद वर्मा से जुड़ा है. साल 1974 में भारतीय क्रांति दल के टिकट पर जीत दर्ज कर बेनी प्रसाद वर्मा पहली बार विधानसभा पहुंचे थे. हालांकि बाद के वर्षों में उनके परिवार का चुनावी प्रदर्शन इस सीट पर पहले जैसा प्रभावशाली नहीं रहा. 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में उनके बेटे राकेश कुमार वर्मा तीसरे स्थान पर रहे.
हड़हा स्टेट के राजीव कुमार सिंह का लंबे समय तक दबदबा

दरियाबाद के चुनावी इतिहास में हड़हा स्टेट के राजीव कुमार सिंह का नाम बेहद महत्वपूर्ण है. वह इस सीट से कुल छह बार विधायक रहे और अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों में अलग-अलग दलों के साथ चुनाव लड़ते रहे. 1985 में उन्होंने कांग्रेस के कृष्णमगन सिंह को हराकर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की. इसके बाद 1989 में कांग्रेस में शामिल होकर चुनाव जीता. 1991 में समाजवादी पार्टी के राधेश्याम वर्मा ने उन्हें शिकस्त दी और 1993 में भी राधेश्याम वर्मा ने उन्हें हराया.
इसके बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं और राजीव कुमार सिंह भाजपा में शामिल हो गए। 1996 और 2002 में भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज करने के बाद उन्होंने फिर समाजवादी पार्टी का रुख किया। 2007 और 2012 में सपा के टिकट पर उन्होंने जीत दर्ज की. इस तरह अलग-अलग दलों के साथ चुनाव लड़ते हुए राजीव कुमार सिंह ने इस सीट पर लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखा.
2017 में बदली तस्वीर, भाजपा ने रचा नया इतिहास
2017 का विधानसभा चुनाव दरियाबाद के लिए निर्णायक मोड़ साबित हुआ. भाजपा की लहर के बीच सतीश चंद्र शर्मा ने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए राजीव कुमार सिंह को बड़े अंतर से हरा दिया. इस जीत ने दरियाबाद की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत की और भाजपा को यहां मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया.
2022 में भी भाजपा का दबदबा बरकरार
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने दरियाबाद सीट पर अपनी स्थिति और मजबूत कर ली. सतीश चंद्र शर्मा ने भाजपा के टिकट पर 1,28,219 वोट हासिल कर जीत दर्ज की. उनके सामने समाजवादी पार्टी के अरविंद कुमार सिंह गोप मैदान में थे, जिन्हें 95,817 वोट मिले। दोनों के बीच जीत का अंतर 32,402 वोट रहा.
इस परिणाम ने साफ कर दिया कि 2017 के बाद भाजपा की पकड़ सिर्फ लहर तक सीमित नहीं रही, बल्कि 2022 में भी पार्टी ने सीट पर मजबूत प्रदर्शन किया.
1962 के बाद का चुनावी इतिहास
दरियाबाद में कांग्रेस, भाजपा और समाजवादी पार्टी के अलावा जनता पार्टी, भारतीय क्रांति दल, जनसंघ और निर्दलीय उम्मीदवार भी जीत दर्ज कर चुके हैं. उपलब्ध चुनावी इतिहास के अनुसार 1962 के बाद इस सीट पर कांग्रेस ने चार बार, भाजपा ने तीन बार और समाजवादी पार्टी ने तीन बार जीत हासिल की। जनता पार्टी ने दो बार, जबकि भारतीय क्रांति दल, जनसंघ और निर्दलीय उम्मीदवार ने एक-एक बार जीत दर्ज की. बसपा के लिए यह सीट अब तक चुनौतीपूर्ण रही है और पार्टी यहां विधानसभा चुनाव में जीत का खाता नहीं खोल सकी है.
2027 में क्या होगा बड़ा मुद्दा?
अब नजरें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 पर हैं। दरियाबाद में भाजपा अपनी मौजूदा पकड़ को बरकरार रखना चाहेगी, जबकि समाजवादी पार्टी पुराने राजनीतिक प्रभाव और सामाजिक समीकरणों के आधार पर वापसी की कोशिश करेगी. इस सीट पर जातीय समीकरण, किसान, बाढ़, रोजगार, सड़क और परिवहन, स्थानीय विकास, कानून-व्यवस्था और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं. सरयू की तराई वाले क्षेत्रों में बाढ़ और उससे जुड़ी समस्याएं स्थानीय मतदाताओं के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण मुद्दा हैं। वहीं कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और रोजगार के सीमित अवसर भी राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बने हुए हैं.










