Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों के लिए होने वाले चुनाव ने विधानसभा चुनाव से पहले सियासी तापमान बढ़ा दिया है। बुधवार को समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी ने नामांकन दाखिल कर दिया। बीजेपी ने अभी अपने उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं, लेकिन सूत्रों के मुताबिक पार्टी की ओर से आठ नामांकन पत्र खरीदे गए हैं। वहीं, सपा की ओर से चार नामांकन पत्र खरीदे जाने की जानकारी सामने आई है, जिनमें से दो पर बुधवार को पर्चा दाखिल किया गया।
ओम प्रकाश राजभर का अखिलेश यादव पर हमला
बताते चले कि, राज्यसभा चुनाव के बीच सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला है।ओपी राजभर ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि सपा राज्यसभा के लिए तीन उम्मीदवार मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है। उन्होंने सवाल किया कि क्या तीनों उम्मीदवार अखिलेश यादव के बताए PDA फॉर्मूले के अनुरूप होंगे।

ओपी राजभर ने अपने बयान में PDA की अलग व्याख्या करते हुए इसे ‘परिवार, दौलतमंद और अपराधी’ बताया और रामगोपाल यादव के नाम को लेकर भी तंज कसा। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर पहला उम्मीदवार ‘परिवार’ से है, तो ‘डी’ और ‘ए’ के तहत कौन आएगा। हालांकि, ये राजभर के राजनीतिक आरोप और उनकी व्याख्या हैं, जिन्हें सपा की ओर से अलग नजरिए से देखा जा सकता है।
‘तीन के चक्कर में दूसरा मत गंवा दीजिएगा’
ओम प्रकाश राजभर ने अपने बयान के अंत में अखिलेश यादव को सलाह देते हुए कहा कि तीसरे उम्मीदवार के प्रयास में दूसरा मत नहीं गंवाना चाहिए। राजभर का इशारा राज्यसभा चुनाव में संभावित क्रॉस-वोटिंग और सपा के पिछले अनुभवों की ओर था। दरअसल, पिछले राज्यसभा चुनाव में सपा के कुछ विधायकों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर मतदान किया था, जिससे पार्टी के सामने इस बार भी अपने विधायकों को एकजुट रखने की चुनौती है।
यूपी राज्यसभा चुनाव का गणित
उत्तर प्रदेश विधानसभा में मौजूदा संख्याबल के मुताबिक बीजेपी के पास 256 विधायक बताए जा रहे हैं। इसके अलावा अपना दल (एस) के 13, आरएलडी के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक हैं। सपा के पास 101, कांग्रेस के 2, जनसत्ता दल के 2 और तीन असंबद्ध विधायक बताए जा रहे हैं। इसके अलावा कुछ सीटें फिलहाल खाली हैं।

राज्यसभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए 37 विधायकों के वोट की जरूरत है। इस गणित के मुताबिक बीजेपी अपने मौजूदा सहयोगी दलों के समर्थन के साथ सात सीटों पर मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। वहीं सपा 74 वोटों के आधार पर अपने दो उम्मीदवारों को जिताने की स्थिति में है। ऐसे में मुकाबले का सबसे अहम केंद्र दसवीं सीट बनती है।
आठवीं राज्यसभा सीट के लिए NDA को चाहिए अतिरिक्त समर्थन
बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के आंकड़े को जोड़ने पर एनडीए के पास बीजेपी के 256, अपना दल (एस) के 13, आरएलडी के 9, सुभासपा के 6 और निषाद पार्टी के 5 विधायक हैं। इनका कुल आंकड़ा 289 होता है। जनसत्ता दल के राजा भैया के दो विधायकों और तीन असंबद्ध विधायकों को जोड़ने पर संख्या 294 तक पहुंचती है। आठ राज्यसभा सीटें जीतने के लिए 37 के हिसाब से 296 वोट चाहिए होंगे। यानी इस गणित में एनडीए को दो अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव में छोटे दलों और निर्दलीय विधायकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है।
सुभासपा के चार विधायकों से बदल सकता है राज्यसभा चुनाव का समीकरण

राज्यसभा चुनाव के गणित में सुभासपा के चार विधायक भी अहम भूमिका में हैं। अब्बास अंसारी, जगदीश नारायण, दूधराम और हंसुराम को लेकर सियासी स्थिति पर नजर है। रिपोर्ट के मुताबिक इन विधायकों के सपा के करीब होने की चर्चा है। अगर ये विधायक एनडीए के पक्ष में मतदान नहीं करते हैं, तो उसके आंकड़े में चार वोट और कम हो सकते हैं। ऐसे में आठवीं सीट के लिए एनडीए को छह अतिरिक्त विधायकों की जरूरत पड़ सकती है।
सपा के तीसरे राज्यसभा उम्मीदवार के लिए चार वोटों की कमी
समाजवादी पार्टी के पास 101 विधायक बताए जा रहे हैं। कांग्रेस के दो विधायकों और सुभासपा के चार संभावित समर्थक विधायकों को जोड़ने पर सपा का आंकड़ा 107 तक पहुंचता है। तीन राज्यसभा सीटें जीतने के लिए 111 वोटों की आवश्यकता होगी। यानी इस गणित के अनुसार सपा को तीसरी सीट के लिए चार अतिरिक्त विधायकों के समर्थन की जरूरत है।

यही वह आंकड़ा है जहां से राज्यसभा चुनाव में असली राजनीतिक जोड़तोड़ शुरू होने की संभावना बनती है। बीजेपी को आठवीं सीट के लिए अतिरिक्त समर्थन चाहिए, जबकि सपा को तीसरे उम्मीदवार को जिताने के लिए अतिरिक्त वोट जुटाने होंगे।
सात विधायकों के पुराने रुख से बढ़ी सपा की चिंता
सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने विधायकों को एकजुट रखने की है। पिछले राज्यसभा चुनाव में पार्टी के सात विधायकों के बागी रुख ने सपा की रणनीति को प्रभावित किया था। इनमें पूजा पाल अब बीजेपी में शामिल हो चुकी हैं। वहीं राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और मनोज पांडेय निर्दलीय विधायक के तौर पर बीजेपी के पक्ष में खड़े रहे हैं। इसके अलावा विनोद चतुर्वेदी, राकेश पांडेय और आशुतोष मौर्य ने पिछले चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया था। इनमें से कुछ विधायक अभी भी सपा से जुड़े हुए हैं। ऐसे में इस बार उनके रुख पर भी राजनीतिक दलों की नजर रहेगी।
10वीं राज्यसभा सीट पर टिकी नजर
मौजूदा आंकड़ों को देखें तो बीजेपी और सपा दोनों के सामने अपने-अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती है। बीजेपी को आठवीं सीट के लिए सहयोगी दलों और संभावित अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ सकती है, जबकि सपा को तीसरे उम्मीदवार के लिए चार या उससे अधिक वोटों का इंतजाम करना पड़ सकता है। पुराने बागी विधायकों का रुख भी अंतिम गणित को प्रभावित कर सकता है।
उत्तर प्रदेश में कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राज्यसभा चुनाव दोनों खेमों के लिए विधायकों के समर्थन, गठबंधन की मजबूती और राजनीतिक संपर्कों की परीक्षा का मौका भी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 10वीं राज्यसभा सीट के लिए जरूरी वोटों का इंतजाम कौन किस तरह करता है और मतदान तक कितने राजनीतिक समीकरण बदलते हैं।










