UP Politics: अखिलेश यादव पर पोस्टरों से हमला, अतीक-मुख्तार की तस्वीरों ने बढ़ाई सियासी हलचल

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के खिलाफ पोस्टर वॉर तेज हो गया है। लखनऊ समेत कई जिलों में लगाए गए पोस्टरों में माफिया, परिवारवाद, भर्ती प्रक्रिया, मुजफ्फरनगर दंगों और कब्रिस्तान के बजट जैसे मुद्दे उठाए गए हैं। पोस्टरों पर लिखे नारों से प्रदेश का सियासी माहौल गरमा गया है।

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Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

अक्टूबर 23, 2026

UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर पोस्टर वॉर तेज हो गया है। राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के 15 प्रमुख जिलों में समाजवादी पार्टी (सपा) और पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव को निशाना बनाते हुए विवादित पोस्टर लगाए जाने का मामला सामने आया है। इन पोस्टरों के सामने आने के बाद प्रदेश का सियासी माहौल गरमा गया है। लखनऊ के नेशनल पीजी कॉलेज चौराहे के अलावा बलिया, मऊ, गाजीपुर, आजमगढ़, वाराणसी, बस्ती, हरदोई और सीतापुर जैसे जिलों में भी पोस्टर लगाए जाने की जानकारी सामने आई है।

इन पोस्टरों में सपा सरकार के पुराने कार्यकाल से जुड़े कई मुद्दों को उठाया गया है। परिवारवाद, भर्ती प्रक्रिया, माफिया और मुजफ्फरनगर दंगों जैसे विषयों के जरिए अखिलेश यादव और उनकी पार्टी पर राजनीतिक हमला किया गया है।

माफिया अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरों से निशाना

माफिया अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की तस्वीरों से निशाना

बताते चले कि, विवादित पोस्टरों में माफिया अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और सपा के वरिष्ठ नेता आजम खान की तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया है। पोस्टरों पर लिखे नारों और तुकबंदी के जरिए सपा के पुराने शासनकाल पर सवाल उठाए गए हैं। एक पोस्टर पर लिखा है, ‘सपाइयों का क्या भरोसा, चाय, समोसा, रस मलाई, सारे माफिया अपने भाई।’ वहीं, दूसरे पोस्टर में लिखा गया है, ‘रसगुल्ला और रसमलाई, एक जाति की सत्ता आई।’ इन नारों के जरिए सपा पर माफिया से कथित नजदीकी और जाति आधारित राजनीति करने के आरोपों को हवा देने की कोशिश की गई है। हालांकि, ये पोस्टर लगाने वाले लोगों की पहचान और उनके पीछे किस संगठन का हाथ है, इसकी पुष्टि जरूरी है।

UPPCS भर्ती और परिवारवाद को लेकर सपा पर हमला

पोस्टर वॉर में भर्ती प्रक्रिया और परिवारवाद का मुद्दा भी उठाया गया है। पोस्टरों में साल 2013 की यूपीपीसीएस भर्ती परीक्षा का जिक्र करते हुए दावा किया गया है कि उस समय 86 में से 56 भर्तियां एक जाति विशेष के लोगों की हुई थीं। यह आरोप पोस्टरों के जरिए लगाया गया है, इसकी स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है।

इसके अलावा, सपा में परिवारवाद को लेकर भी तंज कसा गया है। एक पोस्टर पर लिखा है, ‘दाल चावल और अचार, पार्टी मतलब एक परिवार।’ इस नारे के जरिए अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर परिवार केंद्रित राजनीति करने का आरोप लगाया गया है। भर्ती और परिवारवाद के मुद्दों को उठाकर पोस्टर बनाने वालों ने सपा की राजनीतिक छवि पर सवाल खड़े करने की कोशिश की है।

इफ्तार पार्टी, मुजफ्फरनगर दंगे और कब्रिस्तान बजट का जिक्र

अखिलेश यादव के खिलाफ लगाए गए पोस्टरों में सपा सरकार के कार्यकाल से जुड़ी दूसरी घटनाओं का भी उल्लेख किया गया है। इनमें इफ्तार पार्टियों, मुजफ्फरनगर दंगों और कब्रिस्तान की बाउंड्रीवॉल के लिए कथित तौर पर 200 करोड़ रुपये के आवंटन का जिक्र किया गया है।एक पोस्टर पर लिखा है, ‘खैनी और बनारसी पान, बजट चला गया कब्रिस्तान।’ वहीं, दूसरे पोस्टर में अखिलेश यादव पर तंज कसने के लिए ‘गिरगिटेश’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। इन नारों के जरिए सपा की तत्कालीन सरकार की नीतियों और फैसलों पर राजनीतिक हमला किया गया है।

पोस्टर वॉर से बढ़ी सियासी गर्मी, जवाब का इंतजार

लखनऊ समेत अलग-अलग जिलों में सामने आए इन पोस्टरों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। पोस्टरों के जरिए सपा और अखिलेश यादव को घेरने की कोशिश की जा रही है। खास बात यह है कि इन हमलों में पुराने राजनीतिक विवादों के साथ जाति, भर्ती और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को भी शामिल किया गया है।

फिलहाल, पोस्टर लगाने के पीछे किसका हाथ है और इसे किसी राजनीतिक संगठन ने अभियान के तौर पर चलाया है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। इन पोस्टरों पर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही विवाद की राजनीतिक दिशा और साफ हो सकेगी।