UP Madrasa Action: 558 मदरसे सरकार के रडार पर, 1100 करोड़ के बजट पर उठे सवाल

उत्तर प्रदेश में 558 अनुदानित मदरसों को लेकर सरकार की निगरानी बढ़ गई है। इन संस्थानों से जुड़े करीब 1100 करोड़ रुपये के सालाना बजट और खर्च को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सरकार अनुदानित मदरसों में वित्तीय व्यवस्था और सरकारी धन के इस्तेमाल की पड़ताल की तैयारी में है।

UP Madrasa Action

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अगस्त 24, 2026

UP Madrasa Action : उत्तर प्रदेश में अनुदानित मदरसों से जुड़ी कथित अनियमितताओं को लेकर बड़ी जांच शुरू हुई है। राज्य पुलिस के भ्रष्टाचार निवारण संगठन ने प्रदेश के 558 अनुदानित मदरसों में प्रारंभिक स्तर पर जांच शुरू की है। जांच का मुख्य उद्देश्य नियुक्तियों, सरकारी धन के इस्तेमाल और संस्थानों के प्रशासनिक रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ियों की वास्तविक स्थिति का पता लगाना है।

35 बिंदुओं पर प्रारंभिक जांच की तैयारी

जांच के दायरे में करीब 35 अलग-अलग बिंदु शामिल किए गए हैं। इनमें नियमों के विपरीत नियुक्तियां, अभिलेखों में कथित हेरफेर, संदिग्ध प्रबंध समितियों के जरिए वित्तीय फैसले और वेतन भुगतान में संभावित अनियमितताएं शामिल हैं। इन मदरसों से जुड़े मामलों में सरकारी स्तर पर हर साल करीब 1,100 करोड़ रुपये के बजट का इस्तेमाल होने की बात कही गई है।

कोविड काल की नियुक्तियां भी जांच में आ सकती हैं

जांच के दौरान कोविड-19 महामारी के दौर में हुई नियुक्तियों की भी समीक्षा किए जाने की संभावना है। अधिकारियों की ओर से यह देखा जा सकता है कि उस समय कर्मचारियों और शिक्षकों की नियुक्तियां निर्धारित नियमों के अनुसार हुई थीं या नहीं। इसके अलावा नियुक्त कर्मचारियों की योग्यता और संबंधित संस्थानों में छात्रों की संख्या जैसे पहलुओं की भी जांच हो सकती है।

333 पन्नों की शिकायत में लगाए गए कई आरोप

इस पूरे मामले की शुरुआत 333 पन्नों की एक विस्तृत शिकायत से हुई बताई जा रही है। यह शिकायत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भ्रष्टाचार निवारण संगठन समेत संबंधित अधिकारियों को भेजी गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि कुछ मदरसों में निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए नियुक्तियां की गईं।

दस्तावेजों की प्रमाणिकता पर भी सवाल

शिकायत में शिक्षकों की शैक्षणिक योग्यता, छात्र संख्या और प्रबंध समितियों की वैधता से संबंधित सवाल उठाए गए हैं। साथ ही विभिन्न दस्तावेजों की प्रमाणिकता की जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता की ओर से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त सूचनाएं, विभागीय पत्राचार, जांच से जुड़े दस्तावेज और पहले की शिकायतों के रिकॉर्ड भी उपलब्ध कराए जाने का दावा किया गया है।

सोसायटी रिकॉर्ड और हस्ताक्षरों की जांच की मांग

शिकायत में कुछ सोसायटी रिकॉर्ड में कथित हेरफेर का भी आरोप लगाया गया है। इसके अलावा फर्जी हस्ताक्षर के इस्तेमाल और सरकारी धन से वेतन भुगतान से जुड़े मामलों की फोरेंसिक जांच कराने की मांग की गई है। जांच एजेंसी इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित दस्तावेजों और रिकॉर्ड का मिलान कर सकती है।

चंदे और धार्मिक योगदान की भी जांच की मांग

शिकायत में सरकारी अनुदान के अलावा मदरसों को मिलने वाले चंदे, जकात, सदका और फितरा जैसी धनराशियों के इस्तेमाल में भी कथित गड़बड़ी के आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता ने इन वित्तीय लेनदेन की भी जांच कराने का अनुरोध किया है। हालांकि, इन आरोपों की सत्यता जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

कई जिलों में एक जैसे पैटर्न का दावा

शिकायतकर्ता मोहम्मद तलहा ने अलग-अलग जिलों से जुड़े कई मामलों का हवाला देते हुए दावा किया है कि कथित अनियमितताओं का तरीका कई जगहों पर एक जैसा है। इसी आधार पर शिकायत में किसी संगठित नेटवर्क की संभावित भूमिका की आशंका जताई गई है। अब जांच एजेंसी विभिन्न जिलों के रिकॉर्ड की तुलना कर इस पहलू को भी देख सकती है।

पुरानी विभागीय जांचों पर भी नजर

शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया है कि कुछ मामलों में पहले विभागीय स्तर पर जांच हुई, लेकिन इसके बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। कथित तौर पर कुछ जांच रिपोर्टों को दबाए जाने के आरोपों की भी जांच कराने का आग्रह किया गया है। अगर प्रारंभिक जांच में ऐसे तथ्य सामने आते हैं, तो पुराने मामलों की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।

17 अगस्त को जांच के आदेश

मामले का संज्ञान लेते हुए भ्रष्टाचार निवारण संगठन के महानिरीक्षक मोहित गुप्ता ने 17 अगस्त को जांच का आदेश दिया। यह जिम्मेदारी उपमहानिरीक्षक हरिश्चन्दर को सौंपी गई है। इसके बाद प्रारंभिक स्तर पर मामले से संबंधित रिकॉर्ड और तथ्यों की पड़ताल शुरू होने की जानकारी सामने आई है।

एफआईआर से पहले होती है गोपनीय जांच

नियमों के तहत भ्रष्टाचार निवारण संगठन किसी मामले में सीधे एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक या गोपनीय जांच करता है। मौजूदा मामले में भी इसी प्रक्रिया के तहत जांच आगे बढ़ाई जा रही है। जांच के दौरान नियुक्तियों, सरकारी अनुदान, वेतन भुगतान और प्रबंध समितियों से जुड़े रिकॉर्ड की बारीकी से पड़ताल की जा सकती है।

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने कहा आदेश नहीं मिला

अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के निदेशक शीलधर यादव ने कहा कि उन्हें जांच शुरू होने का आधिकारिक आदेश अभी प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि जांच एजेंसी की ओर से विभाग से कोई जानकारी या रिकॉर्ड मांगा जाता है तो उपलब्ध कराया जाएगा। फिलहाल प्रारंभिक जांच के निष्कर्षों का इंतजार है और इसके आधार पर आगे की कार्रवाई की दिशा तय हो सकती है।

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