UP Election 2027: शिवपुर में BJP-SBSP के बीच दावेदारी, सपा की नई रणनीति से मुकाबला होगा दिलचस्प

वाराणसी की शिवपुर सीट पर 2027 से पहले सियासी हलचल बढ़ती दिख रही है। 2022 में बीजेपी के अनिल राजभर ने सुभासपा के अरविंद राजभर को हराया था। अब सपा की सक्रियता, सुभासपा की संभावित दावेदारी और बीजेपी की रणनीति ने नए सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर अगली बाजी किस समीकरण पर टिकेगी?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

अक्टूबर 7, 2026

UP Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 जैसे-जैसे करीब आ रहा है, वाराणसी जिले की शिवपुर विधानसभा सीट पर राजनीतिक हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में वाराणसी की सीटों का अपना अलग राजनीतिक महत्व है। शिवपुर सीट भी इन्हीं चर्चित क्षेत्रों में शामिल है, जहां पिछले दो विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने मजबूत प्रदर्शन किया है। 2027 में बीजेपी के सामने अपनी पकड़ बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि समाजवादी पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश में हैं।

अहम होगी 2027 की लड़ाई

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को सिर्फ राज्य की सत्ता के लिहाज से ही महत्वपूर्ण नहीं माना जा रहा, बल्कि इसका असर 2029 के लोकसभा चुनाव की राजनीतिक दिशा पर भी पड़ सकता है। उत्तर प्रदेश लोकसभा में 80 सांसद भेजता है, इसलिए विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के प्रदर्शन को राष्ट्रीय राजनीति के संकेतक के तौर पर भी देखा जाएगा। यही वजह है कि बीजेपी, सपा, बसपा और अन्य दल अभी से बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने और मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की तैयारी कर रहे हैं।

शिवपुर सीट
शिवपुर सीट

शिवपुर सीट का राजनीतिक सफर

शिवपुर विधानसभा क्षेत्र को पहले चिराइगांव के नाम से जाना जाता था। परिसीमन के बाद वर्तमान स्वरूप में यह सीट 2012 के विधानसभा चुनाव से अस्तित्व में आई। शिवपुर वाराणसी जिले का हिस्सा है और चंदौली लोकसभा क्षेत्र के विधानसभा क्षेत्रों में शामिल रही है। क्षेत्र में ग्रामीण और शहरी आबादी का मिश्रण है, जिसके कारण यहां चुनावी मुद्दे भी अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्गों के हिसाब से बदलते रहते हैं।

उदय लाल मौर्य
उदय लाल मौर्य

2012 में बसपा ने खोला था खाता

वर्तमान स्वरूप में शिवपुर सीट पर पहला विधानसभा चुनाव 2012 में हुआ था। उस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के उदय लाल मौर्य ने जीत दर्ज की थी। उन्हें करीब 48,716 वोट मिले थे। समाजवादी पार्टी के डॉ. पीयूष यादव दूसरे स्थान पर रहे, जबकि सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और कांग्रेस के उम्मीदवार भी मुकाबले में महत्वपूर्ण वोट हासिल करने में सफल रहे थे। बीजेपी उस चुनाव में अपेक्षाकृत पीछे रही थी।

अनिल राजभर
अनिल राजभर

2017 में बदली तस्वीर, बीजेपी ने मारी बाजी

2017 के विधानसभा चुनाव में शिवपुर का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया। भारतीय जनता पार्टी के अनिल राजभर ने करीब 1.10 लाख वोट हासिल करते हुए बड़ी जीत दर्ज की। उन्हें लगभग 48.47 प्रतिशत वोट मिले। समाजवादी पार्टी के आनंद मोहन यादव करीब 24.66 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जबकि बसपा के वीरेंद्र सिंह को भी लगभग 20.47 प्रतिशत वोट मिले। इस चुनाव में बीजेपी ने पिछले चुनाव की तुलना में अपनी स्थिति में बड़ा सुधार किया।

अनिल राजभर
अनिल राजभर

2022 में अनिल राजभर ने फिर दर्ज की जीत

2022 के विधानसभा चुनाव में शिवपुर सीट पर बीजेपी के अनिल राजभर और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अरविंद राजभर के बीच मुख्य मुकाबला देखने को मिला। अनिल राजभर को 1,15,231 वोट मिले, जबकि अरविंद राजभर को 87,544 वोट हासिल हुए। इस तरह बीजेपी उम्मीदवार ने 27,687 वोट के अंतर से जीत दर्ज की। बसपा के रवि मौर्य करीब 40,601 वोट लेकर तीसरे स्थान पर रहे।

बीजेपी का वोट प्रतिशत रहा मजबूत

2022 के चुनाव में अनिल राजभर को करीब 45.76 प्रतिशत वोट मिले। हालांकि 2017 की तुलना में उनके वोट प्रतिशत में कुछ कमी आई, लेकिन इसके बावजूद वह सीट बचाने में सफल रहे। दूसरी ओर, एसबीएसपी के अरविंद राजभर ने करीब 34.77 प्रतिशत वोट हासिल किए। दोनों के बीच लगभग 11 प्रतिशत से अधिक का वोट प्रतिशत अंतर रहा। इस परिणाम ने यह साफ किया कि शिवपुर में मुकाबला एकतरफा नहीं था।

ग्रामीण मतदाता निभा सकते हैं अहम भूमिका

शिवपुर विधानसभा सीट का चुनावी गणित ग्रामीण मतदाताओं से काफी प्रभावित माना जाता है। खेती-किसानी, सड़क, रोजगार, स्थानीय विकास, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाएं यहां के प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही जातीय समीकरण भी चुनावी रणनीति को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण पहलू रह सकता है। 2027 में राजनीतिक दल ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने पर विशेष जोर दे सकते हैं।

बीजेपी के सामने सीट बचाने की चुनौती

मौजूदा विधायक अनिल राजभर 2017 और 2022 में लगातार दो चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में 2027 में बीजेपी के सामने उनके नेतृत्व में सीट पर अपनी पकड़ बरकरार रखने की चुनौती होगी। बीजेपी संगठन की मजबूती, सरकार के कामकाज और स्थानीय स्तर पर किए गए विकास कार्यों को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है। हालांकि विपक्षी दल भी बीजेपी के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर काम कर सकते हैं।

ओमप्रकाश राजभर
ओमप्रकाश राजभर

SBSP की दावेदारी ने बढ़ाई दिलचस्पी

शिवपुर सीट पर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की संभावित दावेदारी इस चुनाव को और दिलचस्प बना सकती है। एसबीएसपी प्रमुख ओमप्रकाश राजभर का पूर्वांचल की राजनीति में प्रभाव माना जाता है और पार्टी की नजर राजभर समेत अन्य पिछड़े वर्गों के समर्थन पर रहती है। हालांकि 2027 में सीटों के बंटवारे और गठबंधन की तस्वीर चुनाव के करीब ही ज्यादा स्पष्ट होगी।

2022 की हार एसबीएसपी के लिए बड़ा सवाल

2022 में एसबीएसपी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था और शिवपुर से अरविंद राजभर मैदान में थे। उन्हें 87,544 वोट मिले, लेकिन बीजेपी के अनिल राजभर ने उन्हें 27,687 वोट से हरा दिया। यही पिछला परिणाम 2027 की रणनीति में एसबीएसपी के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है। पार्टी को यह तय करना होगा कि वह पिछली हार से आगे निकलकर किस रणनीति के साथ मैदान में उतरती है।

Akhilesh Yadav
Akhilesh Yadav

सपा की रणनीति पर टिकी निगाहें

समाजवादी पार्टी भी शिवपुर सीट को हल्के में लेने के मूड में नहीं दिख रही है। पार्टी की कोशिश ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतारने की हो सकती है जिसकी पकड़ उसके पारंपरिक समर्थक वर्ग के साथ-साथ अन्य सामाजिक समूहों में भी हो। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में सवर्ण या मजबूत ओबीसी चेहरे को लेकर संभावनाएं जताई जा रही हैं, लेकिन अंतिम उम्मीदवार का फैसला पार्टी नेतृत्व और चुनावी समीकरणों पर निर्भर करेगा।

सपा के लिए सामाजिक समीकरण सबसे बड़ा हथियार

समाजवादी पार्टी 2027 में अपने पारंपरिक पीडीए सामाजिक समीकरण के साथ अतिरिक्त सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश कर सकती है। शिवपुर जैसे क्षेत्र में केवल एक जातीय आधार पर चुनाव जीतना आसान नहीं होगा। इसलिए सपा को ऐसा उम्मीदवार चुनना होगा जो संगठन, स्थानीय नेटवर्क और विभिन्न समुदायों के बीच स्वीकार्यता के मामले में मजबूत हो। उम्मीदवार का चयन ही पार्टी की चुनावी रणनीति की दिशा तय कर सकता है।

बसपा भी बिगाड़ सकती है खेल

शिवपुर में बहुजन समाज पार्टी का भी अपना आधार रहा है। 2012 में बसपा ने इस सीट पर जीत दर्ज की थी और 2022 में भी उसके उम्मीदवार रवि मौर्य को 40 हजार से अधिक वोट मिले थे। यदि बसपा 2027 में अपना मजबूत उम्मीदवार उतारती है और उसका वोट आधार बरकरार रहता है, तो वह बीजेपी, एसबीएसपी और सपा के बीच मुकाबले में वोटों के बंटवारे का बड़ा कारण बन सकती है।

जातीय समीकरण पर रहेगी खास नजर

शिवपुर में राजभर, यादव, मौर्य, दलित, सवर्ण और अन्य पिछड़े वर्गों के मतदाताओं की चुनावी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि किसी भी चुनाव में जातीय समीकरण को केवल अनुमान के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, पार्टी संगठन, सरकार के प्रति धारणा और मतदान के समय बनने वाला गठबंधन भी परिणाम को प्रभावित कर सकता है। 2027 में इन सभी कारकों का असर देखने को मिल सकता है।

विकास और रोजगार बन सकते हैं बड़े मुद्दे

शिवपुर के मतदाताओं के बीच सड़क, जल निकासी, बिजली, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण कनेक्टिविटी जैसे स्थानीय मुद्दे महत्वपूर्ण रह सकते हैं। किसानों से जुड़े सवाल और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं। बीजेपी अपने विकास कार्यों को सामने रख सकती है, जबकि विपक्ष स्थानीय समस्याओं और सरकार की कमियों को मुद्दा बनाकर सत्ता पक्ष को घेर सकता है।

बीजेपी और एसबीएसपी के बीच सीट शेयरिंग बड़ा सवाल

2027 में एनडीए के भीतर सीट बंटवारा शिवपुर के समीकरण को सीधे प्रभावित कर सकता है। यदि बीजेपी और एसबीएसपी दोनों इस सीट पर दावा करते हैं, तो गठबंधन के भीतर सहमति बनाना जरूरी होगा। 2022 में एसबीएसपी विपक्षी गठबंधन का हिस्सा थी, जबकि बाद में उसका राजनीतिक रुख बदला। ऐसे में 2027 की सीट शेयरिंग शिवपुर के चुनाव को नई दिशा दे सकती है।

मुकाबला त्रिकोणीय हुआ तो बदल जाएगा गणित

यदि बीजेपी, एसबीएसपी और सपा अलग-अलग मजबूत उम्मीदवार उतारती हैं और बसपा भी पर्याप्त वोट हासिल करती है, तो मुकाबला बहुकोणीय हो सकता है। ऐसी स्थिति में जीत का अंतर कम हो सकता है और अपेक्षाकृत छोटे वोट प्रतिशत बदलाव से भी परिणाम बदल सकता है। 2022 में बीजेपी और एसबीएसपी के बीच मजबूत मुकाबला हुआ था, इसलिए 2027 में विपक्ष की रणनीति पर विशेष नजर रहेगी।

बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?

बीजेपी के सामने सबसे बड़ा सवाल लगातार तीसरी बार सीट जीतने का होगा। अनिल राजभर की व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़, पार्टी संगठन और सरकार की छवि बीजेपी की ताकत बन सकती है। दूसरी तरफ सत्ता विरोधी भावना, स्थानीय मुद्दे और विपक्षी दलों की एकजुट रणनीति बीजेपी के लिए चुनौती पैदा कर सकती है। उम्मीदवार और गठबंधन की अंतिम तस्वीर चुनावी मुकाबले को काफी प्रभावित करेगी।

Akhilesh Yadav
Akhilesh Yadav

सपा के सामने भी आसान राह नहीं

सपा यदि शिवपुर में बीजेपी को चुनौती देना चाहती है तो उसे सिर्फ अपना पारंपरिक वोट बैंक मजबूत करने से आगे बढ़ना होगा। पार्टी को बूथ स्तर पर संगठन सक्रिय करने, गैर-यादव ओबीसी, सवर्ण और अन्य सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने की जरूरत होगी। उम्मीदवार का चयन इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

2027 में किसका पलड़ा भारी होगा?

मौजूदा चुनावी इतिहास बीजेपी को शिवपुर में बढ़त देता है। 2017 और 2022 में पार्टी लगातार जीत दर्ज कर चुकी है। लेकिन 2027 के चुनाव में समीकरण पहले जैसे रहेंगे, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। एसबीएसपी की संभावित दावेदारी, सपा की रणनीति, बसपा का प्रदर्शन और स्थानीय मुद्दे मिलकर मुकाबले की तस्वीर बदल सकते हैं।

शिवपुर में कांटे की टक्कर के संकेत

शिवपुर विधानसभा सीट पर 2027 का चुनाव इसलिए भी खास होगा क्योंकि यहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी पूरी ताकत लगा सकते हैं। बीजेपी के सामने जीत की हैट्रिक को आगे बढ़ाने की चुनौती होगी, एसबीएसपी अपनी राजनीतिक दावेदारी मजबूत करना चाहेगी और सपा बीजेपी के खिलाफ मजबूत उम्मीदवार के जरिए मुकाबला कठिन बनाने की कोशिश करेगी। बसपा के वोट भी निर्णायक साबित हो सकते हैं।

नतीजा किसके पक्ष में जाएगा, अभी बड़ा सवाल

फिलहाल 2027 के चुनाव में किसी एक दल की जीत की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी। उम्मीदवारों की आधिकारिक घोषणा, गठबंधन, सीट शेयरिंग और चुनावी मुद्दों की तस्वीर साफ होने के बाद ही वास्तविक मुकाबले का आकलन संभव होगा। इतना जरूर है कि वाराणसी की शिवपुर सीट पर 2027 में मुकाबला पिछली बार की तुलना में और ज्यादा दिलचस्प होने की संभावना है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि बीजेपी अपनी सीट बचा पाती है, एसबीएसपी दोबारा मजबूत चुनौती देती है या सपा कोई नया राजनीतिक समीकरण तैयार कर बाजी पलट देती है।

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