UP Election 2027: विकास के दम पर खिलेगा कमल या साइकिल मारेगी बाजी? जानिए मथुरा विधानसभा सीट की जमीनी हकीकत!

मथुरा विधानसभा सीट पर यूपी चुनाव 2027 में भाजपा की मजबूत पकड़ और समाजवादी पार्टी की वापसी की कोशिश के बीच मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। श्रीकांत शर्मा की संभावित दावेदारी, PDA समीकरण, धार्मिक पर्यटन, यमुना प्रदूषण, ट्रैफिक जाम, पेयजल और बेरोजगारी जैसे मुद्दे चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

UP Election 2027

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

अक्टूबर 11, 2026

UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में साल 2027 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी तेज होने लगी है।एक तरफ भारतीय जनता पार्टी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति, कानून-व्यवस्था के सख्त मॉडल और बुनियादी विकास कार्यों के दम पर राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की हैट्रिक लगाने का दावा कर रही है।वहीं दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी और विपक्षी दल पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूला, बेरोजगारी,वोट चोरी,महंगाई और स्थानीय मुद्दों को भुनाकर सत्ता में जोरदार वापसी की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज

अगर उत्तर प्रदेश के चुनावी इतिहास पर नजर डालें, तो यहां की हर एक सीट अपने आप में एक अलग सियासी कहानी बयां करती है। कहीं पूर्वांचल और मध्य यूपी की सीटों पर यादव, मौर्या, कुर्मियों और निषाद समाज का वर्चस्व हार-जीत का अंतर तय करता है, तो कहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट, मुस्लिम और दलित वोट बैंक का गठजोड़ सभी सियासी अनुमानों को उलट देता है।

ओबीसी,दलित वोट बैंक पर अखिलेश की नजर

2024 के आम चुनाव में बदले जनादेश के बाद अब यह लड़ाई केवल राजनीतिक दावों तक सीमित नहीं रह गई है। सपा जहां गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटों में अपनी पकड़ मजबूत कर इतिहास दोहराना चाहती है, वहीं बीजेपी अपने मजबूत कोर वोट बैंक के साथ-साथ अपना दल, निषाद पार्टी और आरएलडी जैसे सहयोगियों के दम पर क्षेत्रीय किलेबंदी को अभेद्य बनाने में लगी है। इस बीच, अपने पारंपरिक कैडर को एकजुट करने में जुटी बीएसपी और गठबंधन के सहारे वापसी की उम्मीद देख रही कांग्रेस इस मुकाबले को बहुकोणीय बना रही है।

धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र

उत्तर प्रदेश की धार्मिक और सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले मथुरा जिले की मथुरा विधानसभा सीट  का राजनीतिक और सामाजिक दोनों दृष्टियों से विशेष महत्व है।इस निर्वाचन क्षेत्र के भौगोलिक दायरे में भगवान श्री बांके बिहारी की नगरी वृंदावन, मथुरा शहर (मथुरा नगर निगम/बोर्ड क्षेत्र), मथुरा कैंट, छातीकरा, जैंत, तथा मांट व मथुरा तहसील के कई ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्र शामिल हैं। यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र है, जहां देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की आवाजाही राजनीति को भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती है।

मतदाताओं की कुल संख्या

मतदाताओं की कुल संख्या

नवीनतम चुनावी आंकड़ों और पिछले चुनावों के रुझानों के अनुसार, मथुरा विधानसभा सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 4.5 लाख से 4.6 लाख के बीच है। पिछले कुछ वर्षों में यहां शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में नए मतदाताओं के जुड़ने से इलेक्टोरल बेस में बढ़ोतरी हुई है।

जातिगत समीकरण और मतदाता–प्रतिशत

मथुरा विधानसभा सीट पर किसी एक जाति का पूर्ण एकाधिकार नहीं है, बल्कि यहां का चुनाव हमेशा त्रिकोणीय या बहुकोणीय और बेहद साम्प्रदायिक/जातीय संतुलन पर आधारित रहता है:

ब्राह्मण मतदाता: इस सीट पर ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं,जिनकी कुल आबादी करीब 25% से 27% के आसपास है।

मुस्लिम मतदाता: इनकी संख्या भी लगभग 15% है, जो चुनाव परिणामों को पलटने की क्षमता रखते हैं।

वैश्य (बनिए) एवं पंजाबी समुदाय: व्यापारिक वर्ग से जुड़े ये मतदाता लगभग 10% से 12% हैं, जो परंपरागत रूप से एक तरफ़ा रुझان रखने के लिए जाने जाते हैं।

जाट एवं ठाकुर (क्षत्रिय) समुदाय: इनकी आबादी भी संयुक्त रूप से लगभग 15% से 20% के दायरे में है।

अनुसूचित जाति (दलित) मतदाता: इनकी हिस्सेदारी भी लगभग 15% से 20% है, जो बसपा या अन्य दलों के पक्ष में गोलबंद होते रहे हैं।

जातिगत गोलबंदी: ब्राह्मण बहुल सीट होने के कारण राजनीतिक दल अमूमन इसी वर्ग के उम्मीदवार को तरजीह देते हैं, लेकिन अन्य जातियों (मुस्लिम, वैश्य और दलित) का गठजोड़ हार-जीत तय करता है।यदि विपक्षी दल किसी मजबूत जातीय समीकरण (जैसे ब्राह्मण-दलित या मुस्लिम-दलित गठजोड़) को साधने में कामयाब होते हैं, तो मुकाबला बेहद कड़ा हो सकता है।वहीं, भाजपा अपने हिंदुत्व के एजेंडे और शहरी विकास के नाम पर इस किले को बचाने की जुगत में है।

पिछले विधानसभा चुनावों का सफर (2012 से 2022 तक)

इस सीट पर पिछले तीन विधानसभा चुनावों के परिणाम राजनीतिक उथल-पुथल से भरे रहे हैं:

विधानसभा चुनाव 2012:

जीतने वाले प्रत्याशी: प्रदीप माथुर (कांग्रेस)

हारने वाले प्रत्याशी: देवेंद्र कुमार शर्मा (भाजपा) और अशोक अग्रवाल (सपा)

विधानसभा चुनाव 2017:

जीतने वाले प्रत्याशी: श्रीकांत शर्मा (भारतीय जनता पार्टी – BJP)

हारने वाले प्रत्याशी: प्रदीप माथुर (कांग्रेस)

विधानसभा चुनाव 2022:

जीतने वाले प्रत्याशी: श्रीकांत शर्मा (भारतीय जनता पार्टी – BJP)

श्रीकांत शर्मा

हारने वाले प्रत्याशी: प्रदीप माथुर (कांग्रेस), एस.के. शर्मा (बसपा), और विनेश कुमार सानवल (सपा)

श्रीकांत शर्मा ने अपनी पकड़ मजबूत रखते हुए लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्हें 1,58,859 वोट (लगभग 60.26% वोट शेयर) मिले। उन्होंने कांग्रेस के फिर से मैदान में उतरे दिग्गज प्रदीप माथुर को 1,09,803 मतों के भारी अंतर से हराया। बसपा तीसरे और सपा चौथे स्थान पर खिसक गई थी।

2027  में संभावित प्रत्याशी और राजनीतिक हलचल

भारतीय जनता पार्टी (BJP): भाजपा की ओर से वर्तमान विधायक एवं पूर्व मंत्री श्रीकांत शर्मा प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। हालांकि, पार्टी के भीतर और स्थानीय स्तर पर अन्य कई नेता भी टिकट के लिए अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। यदि पार्टी रिपीट फार्मूला अपनाती है, तो श्रीकांत शर्मा का पलड़ा फिर भारी रह सकता है।

श्रीकांत शर्मा

कांग्रेस पार्टी: कांग्रेस खेमे से पुराने दिग्गज नेता प्रदीप माथुर एक बार फिर सक्रिय हैं, हालांकि उम्र और पिछले दो चुनावों की हार को देखते हुए पार्टी किसी नए या युवा चेहरे पर भी दांव खेल सकती है।

प्रदीप माथुर

समाजवादी पार्टी (SP) एवं बहुजन समाज पार्टी (BSP): सपा और बसपा अपने-अपने सामाजिक समीकरणों (PDA फॉर्मूला या दलित-मुस्लिम गठजोड़) के आधार पर मजबूत चेहरों की तलाश में हैं।पिछले चुनावों में सपा का प्रदर्शन यहां कमजोर रहा है, ऐसे में पार्टी इस सीट पर अपनी स्थिति सुधारने के लिए किसी आक्रामक स्थानीय चेहरे को उतार सकती है।

2027 का राजनीतिक समीकरण: भाजपा की चुनौती बनाम सपा की वापसी की आस

जीरो टॉलरेंस नीति: भाजपा खेमे का मानना है कि,उत्तर प्रदेश में अपराध और अपराधियों के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सख्त कार्रवाई ने राज्य की छवि बदली है।प्रदेश में सुरक्षित माहौल और माफिया राज का अंत पार्टी का सबसे बड़ा चुनावी हथियार है।

धार्मिक पर्यटन का कायाकल्प: मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में तीर्थ विकास परिषद के जरिए सड़कों, गलियों, और पौराणिक धरोहरों का पुनरुद्धार हुआ है।बांके बिहारी कॉरिडोर और ब्रज चौरासी कोस यात्रा के विकास कार्यों को भाजपा अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रख रही है।

गठबंधन का गणित: रालोद (RLD) के एनडीए गठबंधन में शामिल होने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और जाट-बाहुल्य क्षेत्रों में भाजपा की स्थिति पहले से अधिक मजबूत हुई है,हालांकि सीटों के बंटवारे और स्थानीय दावेदारियों को लेकर अंतर्द्वंद्व भी जारी है।

महंगाई, बेरोजगारी और स्थानीय असंतोष

पीडीए और सामाजिक समीकरण: समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव लगातार महंगाई, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।सपा का मुख्य फोकस ग्रामीण और शोषित वर्ग को साधने पर है।

सत्ता विरोधी रुझान:

स्थानीय स्तर पर लंबे समय से विधायकों और शासन के प्रति जनता की कुछ नाराजगी को सपा अपने पक्ष में भुनाने की फिराक में है।पार्टी का मानना है कि ग्राउंड लेवल पर जनता बदलाव चाहती है।

मथुरा विधानसभा सीट (84) की प्रमुख समस्याएं

कान्हा की नगरी होने के बावजूद मथुरा विधानसभा क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं और प्रबंधन के मोर्चे पर कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। चुनाव नजदीक आते ही जनता इन मुद्दों को लेकर मुखर होने लगी है:

पेयजल और सीवर ओवरफ्लो की विकराल समस्या

मथुरा शहर के अधिकांश पुराने इलाकों (जैसे होली गेट, चौक बाजार, और जमुना पार क्षेत्र) में सीवर लाइनें पुरानी हो चुकी हैं।आए दिन सीवर ओवरफ्लो होना और गंदा पानी सड़कों पर भरना आम बात है। शुद्ध पेयजल की आपूर्ति कई मोहल्लों में आज भी दुरुस्त नहीं है, जिससे लोगों को मजबूरन सबमर्सिबल या दूषित पानी पर निर्भर रहना पड़ता है।

यातायात प्रबंधन, संकरी गलियां और भीषण जाम

यातायात प्रबंधन, संकरी गलियां और भीषण जाम

धार्मिक पर्यटन के कारण मथुरा और वृंदावन में रोजाना देश-विदेश से हजारों श्रद्धालुओं का आगमन होता है। इसके बावजूद शहर के मुख्य मार्गों, चौराहों और ई-रिक्शा के बेलगाम संचालन के कारण शहर में भीषण ट्रैफिक जाम की समस्या बनी रहती है।पार्किंग की उचित व्यवस्था न होने से पर्यटकों और स्थानीय लोगों दोनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

यमुना नदी का प्रदूषण और घाटों की बदहाली

यमुना नदी का प्रदूषण और घाटों की बदहाली

यमुना नदी की सफाई और उसमें गिर रहे नालों को रोकने के बड़े-बड़े दावों के बावजूद जमीनी स्तर पर स्थिति संतोषजनक नहीं है।यमुना का प्रदूषित जल और आचमन योग्य पानी न मिलना धार्मिक भावनाओं से जुड़े इस क्षेत्र के लोगों के लिए सबसे बड़ा मलाल है।कई घाटों पर सुविधाओं का अभाव है।

आवारा पशुओं का आतंक

आवारा पशुओं का आतंक

उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों की तरह मथुरा में भी छुट्टा गोवंश और आवारा पशुओं की समस्या विकराल रूप ले चुकी है।खेतों में फसल उजाड़ने से किसान परेशान हैं, तो वहीं शहरी क्षेत्रों में इनकी वजह से आए दिन सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं।

रोजगार और स्थानीय उद्योगों का अभाव

रोजगार और स्थानीय उद्योगों का अभाव

ब्रज क्षेत्र मुख्य रूप से पर्यटन पर आधारित है, लेकिन स्थानीय युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने वाले औद्योगिक कारखाने या आईटी हब यहां स्थापित नहीं हो पाए हैं।छोटे पीतल और हस्तशिल्प उद्योग भी सरकारी संरक्षण और वित्तीय मदद की कमी से जूझ रहे हैं।

विकास बनाम बुनियादी समस्याओं की चुनौती

मथुरा विधानसभा सीट (84) पर 2027 का मुकाबला केवल राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह विकास बनाम बुनियादी जरूरतों का चुनाव बनता दिख रहा है। जहां एक ओर भाजपा अपनी ‘विकास और सुरक्षा’ की गारंटी के सहारे चुनावी वैतरणी पार करना चाहेगी, वहीं जनता की स्थानीय समस्याएं विपक्ष के लिए बड़ा हथियार साबित हो सकती हैं।देखना यह होगा कि,क्या मथुरा की जनता योगी सरकार की नीतियों पर फिर से मुहर लगाती है या बदलाव के पक्ष में अपना जनादेश देती है।