
UP Election 2027 : देश की सियासत का सबसे बड़ा और निर्णायक अखाड़ा यानी उत्तर प्रदेश। कहावत है कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ होकर गुजरता है, लेकिन इस रास्ते पर किसे लाल कालीन मिलेगी और किसके हिस्से वनवास आएगा, इसका फैसला सूबे की 403 विधानसभा सीटों के जटिल समीकरण तय करते हैं।पिछले कुछ दशकों के चुनावी इतिहास को खंगालें, तो यूपी की राजनीति केवल विकास के दावों तक सीमित नहीं रही, बल्कि यहां इतिहास के पन्नों, सामाजिक गोलबंदी और जातीय गणित के संगम से जीत का नया फॉर्मूला तैयार होता है।

यूपी में सियासी पारा हाई
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राज्य का सियासी तापमान अभी से बढ़ने लगा है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘जीरो टॉलरेंस’ (अपराध व भ्रष्टाचार के खिलाफ) मॉडल, कानून-व्यवस्था सुधार और डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों के सहारे लगातार तीसरी बार ऐतिहासिक हैट्रिक लगाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (सपा) अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और स्थानीय जनमुद्दों को हथियार बनाकर सत्ता में वापसी की पुरजोर कोशिश में है।

बुलंदशहर की अनूपशहर सीट का ताना-बाना
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पश्चिम उत्तर प्रदेश का अपना एक अलग और बेहद महत्वपूर्ण स्थान है।आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों की सुगबुगाहट तेज हो चुकी है।इसी कड़ी में बुलंदशहर जिले की हाई-प्रोफाइल अनूपशहर विधानसभा सीट का राजनीतिक और जातीय ताना-बाना एक बार फिर सूबे के सियासी गलियारों में चर्चा के केंद्र में है।
भौगोलिक क्षेत्र और परिचय
पवित्र गंगा नदी के तट पर बसी अनूपशहर विधानसभा सीट अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विशिष्टता के लिए जानी जाती है। धार्मिक महत्व के कारण इसे ‘मिनी काशी’ भी कहा जाता है। यह क्षेत्र कृषि प्रधान है और यहां की आर्थिकी मुख्य रूप से खेती-किसानी और गंगा तटीय व्यापार पर निर्भर है। भौगोलिक रूप से यह बुलंदशहर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली पांच विधानसभा सीटों में से एक है।

मतदाताओं की कुल संख्या
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों और विशेष पुनरीक्षण (SIR) के बाद इस सीट पर मतदाताओं के समीकरण में बदलाव आया है:
कुल मतदाता: अनूपशहर विधानसभा क्षेत्र में वर्तमान में लगभग 3.38 लाख से 3.40 लाख वैध मतदाता पंजीकृत हैं। (2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान यहां करीब 3.85 लाख मतदाता थे, जिनमें समय-समय पर प्रशासनिक संशोधनों के बाद आंशिक परिवर्तन हुआ है)।
क्षेत्रीय बनावट: इस सीट पर ग्रामीण मतदाताओं की संख्या निर्णायक और बहुतायत में है, हालांकि अनूपशहर और जहांगीराबाद जैसे शहरी व अर्ध-शहरी इलाकों का प्रभाव भी चुनावों में स्पष्ट दिखाई देता है।

जातिगत समीकरण:अनूपशहर का सियासी ताना–बाना
अनूपशहर सीट पर जातियों का समीकरण बहुत ही पेचीदा और दिलचस्प है। यहां कोई भी एक अकेली जाति पूरी तरह से जीत की गारंटी नहीं दे सकती, इसलिए गठजोड़ और जातियों का सामंजस्य ही हार-जीत तय करता है। अनुमानित जातिगत आंकड़े इस प्रकार हैं:
| प्रमुख जाति / समुदाय | अनुमानित मतदाताओं की संख्या (लगभग) |
| मुस्लिम | ~82,000 |
| लोधी (पिछड़ा वर्ग) | ~54,000 |
| जाट | ~42,000 |
| ब्राह्मण | ~31,000 |
| अनुसूचित जाति (SC) | ~30,000 (अन्य उपजातियां मिलाकर) |
| ठाकुर / राजपूत | ~28,000 |
| गुर्जर | ~12,000 |
| बनिया | ~11,000 |
| प्रजापति, गिरि/गोसाईं व अन्य | ~10,000 – 15,000 |
2027 में जातिगत भूमिका: अनूपशहर में मुस्लिम मतदाता सबसे बड़ा एकल समूह बनाते हैं। वहीं, लोधी और जाट मतदाता इस सीट पर मजबूत स्थिति में हैं। ब्राह्मण मतदाता यहां ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाते हैं और सामान्य तथा सवर्ण वर्ग का झुकाव चुनाव के रुख को मोड़ने में अहम होता है। इसके अलावा, अति पिछड़ी जातियों (MBC) और दलित मतों का बिखराव या समेकन जीत-हार का अंतर तय करता है।
चुनावी इतिहास:2012 से 2022 तक किसका रहा दबदबा?

2012 विधानसभा चुनाव:
इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार गजेंद्र सिंह ने बाजी मारी थी। उन्होंने समाजवादी पार्टी के सैयद हिमायत अली को बेहद कड़े मुकाबले में करीब 3,501 वोटों के अंतर से हराया था। यह मुकाबला बेहद करीबी रहा था।
2017 विधानसभा चुनाव:

सूबे में चली ‘मोदी लहर’ के बीच बीजेपी ने इस सीट पर सेंध लगाई। बीजेपी उम्मीदवार संजय कुमार शर्मा ने शानदार जीत दर्ज करते हुए बसपा की हैट्रिक पर रोक लगाई। संजय शर्मा ने बसपा के गजेंद्र सिंह को भारी अंतर (लगभग 60,314 वोट) से शिकस्त दी।

2022 विधानसभा चुनाव:
इस चुनाव में बीजेपी के विधायक संजय कुमार शर्मा ने अपनी पकड़ को और मजबूत करते हुए ऐतिहासिक जीत दर्ज की। बीजेपी ने यहां बसपा उम्मीदवार रामेश्वर को रिकॉर्ड 77,623 वोटों के भारी अंतर से हराया। इस चुनाव में सपा ने यह सीट अपने गठबंधन के तहत एनसीपी (NCP) को दी थी, जिसके प्रत्याशी के.के. शर्मा तीसरे स्थान पर रहे थे। बीजेपी को इस चुनाव में लोधी, जाट और सवर्ण मतों का एकतरफा समर्थन मिला था।
2027 का राजनीतिक परिदृश्य कौन–कौन ठोक सकता है ताल?

भारतीय जनता पार्टी:
भारतीय जनता पार्टी इस सीट पर अपनी लगातार दो बार की जीत (2017 और 2022) के बाद बेहद मजबूत स्थिति में है।पार्टी का मुख्य फोकस हिंदुत्व के साथ-साथ लोधी, जाट और ब्राह्मण मतों के पुराने समीकरण को साधना होगा। वर्तमान विधायक संजय कुमार शर्मा के कार्यकाल और संगठन की सक्रियता के बूते पार्टी एक बार फिर यहां से प्रबल दावेदार के रूप में उतरेगी। हालांकि, टिकट वितरण और सत्ता विरोधी रुझान को काटना पार्टी के लिए चुनौती होगी।

समाजवादी पार्टी और विपक्षी गठबंधन (INDIA):
चूंकि पिछले कुछ चुनावों में सपा सीधे तौर पर इस सीट पर मुख्य मुकाबले में थोड़ा पीछे रही है (या गठबंधन के तहत अन्य दलों को सीट दी गई), 2027 में सपा इस बार अपनी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी में है। मुस्लिम और पिछड़ों के गठजोड़ के सहारे सपा इस दुर्ग को भेदने की रणनीति पर काम कर रही है।
बहुजन समाज पार्टी : कभी अनूपशहर में गहरी पैठ रखने वाली बसपा अपने पुराने काडर वोट (दलित मतदाताओं) को वापस साधने के लिए काम कर रही है। यदि बसपा किसी मजबूत स्थानीय चेहरे को उतारती है, तो मुकाबला त्रिकोणीय होने की पूरी संभावना है।
कांग्रेस पार्टी: कांग्रेस भी इंडिया गठबंधन के समीकरणों के तहत इस क्षेत्र में अपनी खोई हुई जमीन (आखिरी बार 1996 में जीते सतीश शर्मा)को वापस पाने के लिए स्थानीय मुद्दों और सामाजिक न्याय के एजेंडे के साथ जोर लगा सकती है।

बुलंदशहर की अनूपशहर सीट की प्रमुख जनसमस्याएं
किसान सहकारी चीनी मिल की उपेक्षा व पेराई क्षमता न बढ़ना
अनूपशहर की किसान सहकारी चीनी मिल (स्थापना 1977) क्षेत्र के हजारों गन्ना किसानों की आजीविका का मुख्य जरिया है।
समस्या: चीनी मिल की पेराई क्षमता बढ़ाने की मांग दशकों से लंबित है। मशीनें पुरानी और जर्जर होने के कारण पेराई सत्र के दौरान अक्सर तकनीकी खराबी आ जाती है।
असर: किसानों को अपना गन्ना दूर-दराज की दूसरी मिलों में ले जाना पड़ता है या कम दाम में क्रैशरों पर बेचना पड़ता है, जिससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

शिक्षा के बुनियादी ढांचे की कमी (सरकारी कॉलेजों का अभाव)
आजादी के दशकों बाद भी अनूपशहर में एक भी अर्द्ध-सरकारी या बड़ा राजकीय डिग्री/इंटर कॉलेज स्थापित नहीं हो पाया है।उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के लिए स्थानीय छात्र-छात्राओं को बुलंदशहर, अलीगढ़ या दिल्ली-एनसीआर का रुख करना पड़ता है।गरीब और ग्रामीण पृष्ठभूमि की छात्राओं को उच्च शिक्षा छोड़नी पड़ती है या निजी संस्थानों की महंगी फीस भरनी पड़ती है।

यातायात व्यवस्था व बस स्टैंड की मांग
जहांगीराबाद में बस अड्डे का न होना: अनूपशहर विधानसभा का एक बड़ा कस्बा जहांगीराबाद है, जहां आज तक एक व्यवस्थित रोडवेज बस अड्डा नहीं बन सका है।
रोडवेज बसों का कम संचालन: दिल्ली-बदायूं मार्ग पर चलने वाली अधिकतर बसें अनूपशहर होकर नहीं गुजरती हैं, जिससे दिल्ली व आसपास के शहरों में काम करने वाले यात्रियों को काफी असुविधा होती है।
रेलवे लाइन का अभाव: क्षेत्र को दिल्ली और अन्य बड़े व्यापारिक शहरों से जोड़ने के लिए सीधी रेलवे लाइन की मांग भी लंबित है।
जलभराव और जर्जर सड़कें
आहार रोड पर जलभराव: अनूपशहर से आहार जाने वाले मार्ग पर बारिश के दिनों में जलभराव की विकराल समस्या पैदा हो जाती है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था न होने के कारण दर्जनों गांवों का संपर्क कट जाता है।
औरंगाबाद कस्बा: औरंगाबाद नगर में गंदे पानी की निकासी न होने के कारण बारिश ही नहीं, बल्कि सामान्य दिनों में भी सड़कों पर नालियों का पानी बहता रहता है।

गंगा तट एवं पर्यटन विकास की अनदेखी
अनूपशहर को “छोटी काशी” भी कहा जाता है और यहां गंगा किनारे बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।स्थानीय लोगों और घाट संचालकों का आरोप है कि गंगा किनारे धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने, पक्के घाटों के सुंदरीकरण और स्वच्छता प्रबंधन के लिए जितनी योजनाएं बननी चाहिए थीं, वे जमीनी स्तर पर नहीं उतर सकी हैं।

लो–वोल्टेज और लोकल फॉल्ट्स
हालांकि विद्युत सब-स्टेशनों और लाइन बिछाने का काम हुआ है, लेकिन ग्रामीण इलाकों और अंदरूनी मोहल्लों में अभी भी लो-वोल्टेज और ओवरलोडिंग के कारण अक्सर ट्रांसफार्मर फुंकने और बिजली कटौती की समस्या बनी रहती है।
2027 की सियासी चुनौती: सपा और विपक्षी दल जहां स्थानीय उपेक्षा, बेरोजगारी, बंद पड़े उद्योगों और सड़कों की खस्ताहाली को लेकर विधायक व सरकार को घेर रहे हैं,वहीं भाजपा अपने सड़कों के चौड़ीकरण, विद्युत सुधार और विकास कार्यों के बल पर जीत दोहराने का भरोसा जता रही है।
अनूपशहर विधानसभा सीट पर 2027 का चुनाव बेहद रोमांचक होने वाला है। जहां एक तरफ बीजेपी अपने विकास कार्यों और सांगठनिक पकड़ के दम पर कमल को बरकरार रखने की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष (सपा-गठबंधन और बसपा) जातीय समीकरणों के गुणा-भाग और स्थानीय मुद्दों को हथियार बनाकर सत्ता परिवर्तन की जुगत में रहेगा।यहां की जीत-हार इस बात पर निर्भर करेगी कि कौन सा दल जाट, लोधी, मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाताओं के बीच बेहतरीन सामंजस्य बिठाने में सफल होता है।
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