‘सफाई साथी अभियान’ के तहत पतरातू डैम पर शुरू हुई अनोखी पहल की हो रही चर्चा

रांची रामगढ़ जिला अंतर्गत पतरातू डैम के पास एक नई पहल की शुरुआत हुई है। यहां बीआइटी मेसरा के छात्र छात्राओं ने यत्र तत्र फेंकी हुई पानी की बोतल से बेहद मजबूत डस्टबिन बनाए हैं। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह बेहद सशक्त संदेश है, जिसकी खूब चर्चा हो रही है। बीआईटी मेसरा के छात्रों ने वेस्ट वाटर और प्लास्टिक बोतलों से डस्टबिन बनाए। बीआईटी मेसरा के डिपार्टमेंट आफ मैनेजमेंट की मानसी सिंह और उनकी टीम ने 'सफाई साथी अभियान' के तहत पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता पर जोर दिया है। इस तरह का प्रयोग पहली बार राज्य के किसी संस्थान

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Published On :

मई 9, 2026

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रांची

रामगढ़ जिला अंतर्गत पतरातू डैम के पास एक नई पहल की शुरुआत हुई है। यहां बीआइटी मेसरा के छात्र छात्राओं ने यत्र तत्र फेंकी हुई पानी की बोतल से बेहद मजबूत डस्टबिन बनाए हैं। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में यह बेहद सशक्त संदेश है, जिसकी खूब चर्चा हो रही है।

बीआईटी मेसरा के छात्रों ने वेस्ट वाटर और प्लास्टिक बोतलों से डस्टबिन बनाए। बीआईटी मेसरा के डिपार्टमेंट आफ मैनेजमेंट की मानसी सिंह और उनकी टीम ने 'सफाई साथी अभियान' के तहत पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छता पर जोर दिया है।

इस तरह का प्रयोग पहली बार राज्य के किसी संस्थान के छात्र छात्राओं द्वारा किया गया है। वेस्ट वाटर बोतलों, प्लास्टिक बोतलों से बनाए गए डस्टबिन को पतरातू में लगाया गया है, जिसे बीआइटी मेसरा के डिपार्टमेंट आफ मैनेजमेंट के छात्रों द्वारा तैयार किया गया है।

छात्रा मानसी कुमारी ने बताया कि कहीं भी आप जाएं तो आपके इर्द गिर्द बेकार पड़ी पानी की बोतलें फेंकी रहती हैं, जो हमारे पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। हमारी टीम ने इन बोतलों को नया रूप देने की ठानी और पतरातु डैम से इसकी शुरुआत की गई है।

वहां हमलोग गए और फेंकी हुई बोतल को जमा कर डस्टबिन का रूप देने में लगा गए। जब डस्टबिन तैयार हो गया तो देखने में बेहद आकर्षक लग रहा था। आसपास के लोग भी इस नए प्रयोग को देखने जुट गए।

उन्होंने बताया कि बीआईटी मेसरा कैंपस में भी प्रतिदिन बोतलें जहां तहां फेंकी दिख जाती हैं। जिसका उपयोग हम रचनात्मक कार्यों में कर सकते हैं। इस नेक कार्य में संस्थान के यूथ टूरिज्म क्लब का भी भरपूर सहयोग मिला।

क्लब की मीनाक्षी, हनाफ, गौतम, स्नेहल, तनिष्क, निधि, ईशा, साकेत, मुस्कान जैसे सहयोगियों ने मिलकर इस कार्य को अंजाम तक पहुंचाया। अपने अनुभव साझा करते मानसी ने बताया कि जब मेसरा कैंपस में फेंकी हुई बोतल को चुनती थी तो वहां सहयोगी और कुछ लोग कहते थे कि एमबीए करने के बाद अब यही काम तुम्हें करना बाकी रह गया है, लेकिन हमने फेंकी हुई बोतल से डस्टबिन बनाने की ठान ली थी तो पीछे नहीं हटी।

यही कारण है कि डस्टबिन इंस्टालेशन की शुरुआत पतरातु से की। हालांकि, मेसरा कैंपस में भी जल्द ही एक डस्टबिन इंस्टाल करूंगी। बताया कि आमतौर एक नीले और पीले रंग के डस्टबिन की कीमत 4500 रूपये होती है जबकि बेकार या फेंकी हुई प्लास्टिक बोतलों से यह डस्टबिन महज 1200 रूपये में तैयार की जा रहीं हैं।

बोतल को जमा कर की पेंटिंग
मानसी सिंह ने बताया कि सबसे पहले हमने फेंकी हुई बोतलों को जमा किया। अच्छी तरह से धोने के बाद बोतल की पेंटिंग की ताकि दिखने में आकर्षक लगे। कहा कि झारखंड में यह पहल पहली बार की जा रही है, जिसमें वेस्ट प्लास्टिक बोतलों से डस्टबिन बनाकर स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा की जा रही है।

मानसी ने बताया कि हमने देखा की अक्सर ये बोतलें नालों में चली जाती हैं जो न सिर्फ पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है बल्कि बरसाती दिनों यही जमा बोतलें नाला जाम का कारण बनती हैं और नाले का गंदा पानी उफनकर बाहर निकलता है और गंदगी फैलती है।

इस समस्या को देखते हुए मानसी सिंह और उनकी टीम ने 'सफाई साथी अभियान' की शुरुआत करने का निर्णय लिया। इस पहल के अंतर्गत इस्तेमाल हो चुकी प्लास्टिक बोतलों को पुनः उपयोग करके डस्टबिन बनाए जा रहे हैं, ताकि कचरे का सही प्रबंधन हो सके और लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी बढ़े।

उन्होंने कहा कि इस डस्टबिन को बनाने और पतरातु डैम जाकर इंस्टाल करने में प्रबंधन की अनुमति के लिए चार माह का समय लग गया जबकि आमजनों से जुड़ा यह नवाचार है।

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