UGC New Rules: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किए गए नए नियमों को लेकर देशभर के शैक्षणिक संस्थानों में बहस तेज हो गई है। इन नियमों को लेकर जहां कुछ लोग इसे सुधार की दिशा में जरूरी कदम बता रहे हैं, वहीं कई शिक्षक और छात्र इसे एकतरफा और विवादास्पद मान रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शिक्षकों और छात्रों से बातचीत की, जहां इस मुद्दे पर अलग-अलग और तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
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छात्रों की राय: आंशिक सहमति, लेकिन आशंकाएं बरकरार
विश्वविद्यालय के छात्र विकास मिश्रा का मानना है कि नए नियमों में कुछ सकारात्मक पहलू जरूर हैं, लेकिन यह पूरी तरह संतुलित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि आज भी कई विश्वविद्यालयों में छात्रों को उनके नाम और जाति के आधार पर देखा जाता है। ऐसे में जरूरी है कि नए नियमों का दुरुपयोग न हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी छात्र के साथ अन्याय न किया जाए।
‘काला कानून’ बताकर जताई कड़ी आपत्ति
छात्र रोहित मिश्रा ने यूजीसी के इस नियम को बेहद कठोर बताते हुए इसे “काला कानून” करार दिया। उनका कहना था कि यह कानून एससी-एसटी एक्ट से भी ज्यादा सख्त है और विशेष रूप से स्वर्ण समाज के लिए अन्यायपूर्ण साबित हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह नियम ब्रिटिश काल के दमनकारी कानूनों से भी ज्यादा कठोर है। रोहित ने यह सवाल भी उठाया कि जब समिति में पिछड़े वर्ग, महिलाएं और दिव्यांगों को शामिल किया गया है, तो स्वर्ण वर्ग का कोई प्रतिनिधि क्यों नहीं रखा गया। उनके मुताबिक, अगर समिति में स्वर्ण समाज से भी एक सदस्य होता, तो इससे निष्पक्षता बनी रह सकती थी।
निजी दुश्मनी निकालने का डर
कुछ अन्य छात्रों ने आशंका जताई कि इन नियमों का इस्तेमाल निजी रंजिश या दुश्मनी निकालने के लिए किया जा सकता है। उनका मानना है कि यदि व्यवस्था में संतुलन नहीं रखा गया, तो यह नियम सामाजिक समरसता को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं कुछ छात्रों ने इसे जातिवाद को बढ़ावा देने वाला कदम भी बताया।
शिक्षकों की नाराजगी
शिक्षक यूजीसी की गाइडलाइंस को लेकर नीति निर्माताओं से अपील के साथ-साथ चुनौती भी दी। उन्होंने कहा कि यदि आरक्षण की व्यवस्था इतनी जरूरी मानी जा रही है, तो फिर आरक्षित वर्ग के छात्रों को पढ़ाने के लिए भी आरक्षित वर्ग के शिक्षक ही नियुक्त किए जाएं। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में यह भी कहा कि इसी तर्क पर आरक्षित वर्ग के मरीजों का इलाज भी आरक्षित वर्ग के डॉक्टर ही करें। डॉ. मिश्र का कहना था कि नीतियां बनाते समय स्वर्ण वर्ग के हितों और चिंताओं पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
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‘देश को बांटने की साजिश’ करार
एक अन्य शिक्षक डॉ. साकेत शुक्ला ने इस पूरे मामले को समाज और देश को बांटने की साजिश बताया। उनके अनुसार, इस तरह की व्यवस्थाएं भाई-भाई और मित्रों के बीच विभाजन पैदा कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में स्वर्ण समाज संख्या के लिहाज से अल्पसंख्यक होता जा रहा है, ऐसे में यह तर्क समझ से परे है कि अल्पसंख्यक बहुसंख्यक पर अत्याचार कर सकता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब समिति का गठन किया गया, तब उसमें स्वर्ण वर्ग से किसी भी व्यक्ति को क्यों शामिल नहीं किया गया। उनके मुताबिक, यदि शिकायत स्वर्ण वर्ग के खिलाफ आए और समिति में उसका कोई प्रतिनिधि न हो, तो उस प्रक्रिया को निष्पक्ष कैसे कहा जा सकता है।








