Turkman Gate Demolition: तुर्कमान गेट से 2026 तक बुलडोजर की गूंज, इमरजेंसी काल की यादें फिर हुईं ताजा

क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है? 1976 के उस खौफनाक मंजर के ठीक 50 साल बाद, तुर्कमान गेट की गलियां एक बार फिर बुलडोजर की गड़गड़ाहट और चीख-पुकार से गूंज उठीं। आधी रात को शुरू हुई इस गुप्त कार्रवाई ने पूरे इलाके को छावनी में बदल दिया। आखिर क्या है वह अदालती आदेश जिसने सोती हुई दिल्ली को अचानक जंग के मैदान में झोंक दिया?

Turkman Gate Demolition

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जनवरी 7, 2026

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Turkman Gate Demolition : अप्रैल 1976 का समय देश के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे विवादास्पद दौर माना जाता है। देश में इमरजेंसी लागू थी और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, लेकिन प्रशासनिक फैसलों में उनके बेटे संजय गांधी की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही थी। आलोचकों का आरोप था कि सत्ता का वास्तविक संचालन संजय गांधी के हाथों में चला गया था और उनके आदेशों को चुनौती देना लगभग असंभव हो गया था।

तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद तक ‘खुला नज़ारा’

इसी दौरान दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके का एक वाकया इतिहास में दर्ज हो गया। संजय गांधी ने वहां जाते हुए कहा था कि वे चाहते हैं कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद साफ दिखाई दे। उस समय उनके साथ दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) के वाइस चेयरमैन जगमोहन मल्होत्रा मौजूद थे, जिन्हें संजय गांधी का करीबी माना जाता था। इस कथन को जगमोहन ने एक आदेश की तरह लिया।

बुलडोजर कार्रवाई का फैसला

संजय गांधी की इच्छा को पूरा करने के लिए यह तय किया गया कि तुर्कमान गेट और जामा मस्जिद के बीच मौजूद सभी बस्तियों और ढांचों को ध्वस्त कर दिया जाएगा। 13 अप्रैल 1976 को इलाके में बुलडोजर पहुंचा। शुरुआत में फुटपाथ गिराए गए ताकि लोगों का विरोध कम किया जा सके। BBC की रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों को पहले यह नहीं बताया गया था कि उनके घर भी गिराए जाएंगे।

बेदखली के खिलाफ महिलाओं का विरोध

बेदखली अभियान कई दिनों तक चलता रहा। 19 अप्रैल 1976 को हालात उस समय बिगड़ गए जब करीब 500 महिलाएं अपने बच्चों के साथ मौके पर पहुंचीं। उन्होंने काले रिबन बांधकर बुलडोजर के सामने खड़े होकर विरोध किया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए CRPF को तैनात किया गया। जल्द ही माहौल हिंसक हो गया और भीड़ ने मलबे से पत्थर फेंकने शुरू कर दिए।

फायरिंग और मौतों का विवाद

पुलिस और CRPF ने जवाबी कार्रवाई करते हुए फायरिंग की। आधिकारिक आंकड़ों में उस दिन केवल 6 लोगों की मौत बताई गई, लेकिन स्थानीय लोगों और चश्मदीदों का दावा था कि अनौपचारिक रूप से मृतकों की संख्या 150 से अधिक थी। कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए और इस पूरे अभियान में लगभग सात लाख लोग बेघर हो गए।

संजय गांधी पर गंभीर आरोप

आरोप लगाए गए कि जब स्थानीय सांसद संजय गांधी के पास विरोध दर्ज कराने पहुंचे, तो उन्होंने उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया। यह भी कहा गया कि संजय गांधी इस इलाके को ‘मिनी पाकिस्तान’ के रूप में देखते थे और ब्यूटीफिकेशन के नाम पर पूरी बस्ती को मिटा दिया गया। कई आलोचकों का मानना है कि भारत में जिस ‘बुलडोजर जस्टिस’ की आज चर्चा होती है, उसकी शुरुआत यहीं से हुई।

50 साल बाद फिर गूंजा बुलडोजर

यह इतिहास एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है। हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद नगर निगम ने तुर्कमान गेट और फैज-ए-इलाही इलाके में आधी रात बुलडोजर कार्रवाई शुरू की। पूरे क्षेत्र में बैरिकेडिंग कर दी गई थी, लेकिन कार्रवाई शुरू होते ही भारी भीड़ जमा हो गई।भीड़ ने अवैध निर्माण गिराने का विरोध किया और पुलिस पर ईंट-पत्थर फेंके गए। इस हमले में कम से कम पांच पुलिसकर्मी घायल हुए। हालात काबू में करने के लिए पुलिस को आंसू गैस और लाठीचार्ज का सहारा लेना पड़ा। इस घटना ने लोगों को 50 साल पुराने तुर्कमान गेट कांड की याद दिला दी।

इतिहास और वर्तमान का टकराव

तुर्कमान गेट की कहानी एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि विकास और कानून के नाम पर की जाने वाली कार्रवाइयों में मानवीय संवेदनाओं की जगह कहां है। इमरजेंसी काल से लेकर आज तक, यह इलाका सत्ता, विरोध और बुलडोजर राजनीति का प्रतीक बना हुआ है।

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