Operation Epic Fury End : ईरान और अमेरिका के बीच जारी भीषण संघर्ष को अब पांच हफ्ते पूरे होने वाले हैं, लेकिन युद्ध के मैदान से आ रही खबरें वाशिंगटन के लिए अनुकूल नहीं दिख रही हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब अपनी सैन्य रणनीति में बड़े बदलाव के संकेत दे रहे हैं। ऐसी चर्चाएं तेज हैं कि अमेरिका अपने सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को समय से पहले ही समेटने की तैयारी में है। चौंकाने वाली बात यह है कि ट्रंप ने इस युद्ध को शुरू करते समय जो लक्ष्य निर्धारित किए थे—जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाना, ईरान के साथ नई परमाणु डील करना या तेहरान को आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना—उनमें से एक भी पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप इस मोर्चे पर अपनी विफलता स्वीकार कर रहे हैं?
NATO सहयोगियों से तकरार और ‘कागजी शेर‘ का तंज
अमेरिकी राष्ट्रपति का हालिया इंटरव्यू अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचा रहा है। ‘डेली टेलीग्राफ’ को दिए साक्षात्कार में ट्रंप ने अमेरिका को नाटो (NATO) गठबंधन से बाहर निकालने की धमकी दी है। ट्रंप ने नाटो को एक ‘कागजी शेर’ करार दिया है, जिसकी विश्वसनीयता पर उन्हें लंबे समय से संदेह था। उनका यह गुस्सा तब फूटा जब ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, स्पेन और स्विट्जरलैंड जैसे प्रमुख सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में साथ देने से इनकार कर दिया। ट्रंप का मानना है कि पुतिन जैसे वैश्विक नेता भी जानते हैं कि नाटो अब केवल नाम का गठबंधन रह गया है, जो संकट के समय अमेरिका के काम नहीं आ रहा।
मिसाइल भंडार में कमी और बढ़ता आर्थिक बोझ
अमेरिका के पीछे हटने का एक बड़ा कारण रक्षा संसाधनों की भारी कमी भी है। अमेरिकी रक्षा दस्तावेजों के अनुसार, ईरान के खिलाफ पिछले एक महीने में अमेरिका ने औसतन 850 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें दागी हैं। वर्तमान में अमेरिका के पास केवल 3,992 टॉमहॉक मिसाइलों का स्टॉक बचा है, जो इसी रफ्तार से खर्च होने पर अगले 4 महीनों से भी कम समय में समाप्त हो जाएगा। इसके अलावा, युद्ध का आर्थिक बोझ भी कमर तोड़ रहा है। अमेरिका इस जंग में रोजाना करीब 1 अरब डॉलर खर्च कर रहा है, और पिछले एक महीने में यह आंकड़ा 36 अरब डॉलर को पार कर गया है, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव बना है।
यूरोपीय देशों का असहयोग और ब्रिटेन का रुख
मिडिल ईस्ट में अमेरिका खुद को अलग-थलग महसूस कर रहा है। फ्रांस, इटली और स्विट्जरलैंड ने न केवल युद्ध में शामिल होने से मना किया, बल्कि अपने हवाई क्षेत्रों और सैन्य ठिकानों पर अमेरिकी विमानों के उतरने पर भी पाबंदी लगा दी। ब्रिटेन ने स्पष्ट किया है कि वह केवल रक्षात्मक कार्रवाई और अपने हितों की रक्षा तक सीमित रहेगा। ब्रिटिश रक्षा मंत्री जॉन हीली ने कहा कि वे क्षेत्रीय स्थिरता और ईरानी ड्रोन हमलों को रोकने के लिए सहयोगियों के साथ काम कर रहे हैं, लेकिन वे अमेरिका के आक्रामक अभियान का हिस्सा नहीं बनेंगे।
होर्मुज स्ट्रेट की प्राथमिकता और ईरान का नुकसान
‘द वॉल स्ट्रीट जनरल’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने अब होर्मुज जलडमरूमध्य को जबरन खुलवाने की योजना को पीछे धकेल दिया है। अमेरिका को डर है कि इस मार्ग को खोलने की कोशिश युद्ध को और लंबा और घातक बना सकती है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित होने से पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था कराह रही है। दूसरी ओर, ईरान ने भी इस युद्ध में भारी कीमत चुकाई है। ईरान के सुप्रीम लीडर और शीर्ष कमांडरों की मौत के अलावा, करीब 4700 सुरक्षाकर्मियों की जान जा चुकी है। ईरानी रेड क्रिसेंट के अनुसार, अमेरिकी-इजरायली हमलों में 760 स्कूल, 300 स्वास्थ्य केंद्र और 90,000 से अधिक आवासीय इकाइयां मलबे में तब्दील हो गई हैं।
इस विनाश के बावजूद, ईरान झुकने को तैयार नहीं है, जिसने अमेरिका को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया है। अब देखना यह होगा कि क्या ट्रंप बिना किसी ठोस नतीजे के इस युद्ध से बाहर निकलने का जोखिम उठाते हैं।










