Trump’s China Visit: वैश्विक राजनीति के मंच पर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। व्हाइट हाउस के आधिकारिक सूत्रों ने पुष्टि की है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगामी 31 मार्च से 2 अप्रैल के बीच चीन की तीन दिवसीय यात्रा पर जाएंगे। यह दौरा कूटनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लगभग नौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद ट्रंप फिर से बीजिंग की धरती पर कदम रखेंगे। इससे पहले उन्होंने 2017 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान चीन की यात्रा की थी। इस यात्रा का प्राथमिक उद्देश्य विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच जमी बर्फ को पिघलाना और आपसी संबंधों को एक नई दिशा देना है।
द्विपक्षीय वार्ता के प्रमुख मुद्दे: व्यापार से लेकर ताइवान तक
बीजिंग में होने वाली इस हाई-प्रोफाइल मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग और डोनाल्ड ट्रंप के बीच कई ज्वलंत वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होगी। एजेंडे में व्यापार घाटा, ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में ईरान की भूमिका जैसे विषय शामिल हैं। ट्रंप ने संकेत दिया है कि यह वार्ता केवल तनाव कम करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भविष्य के लिए एक स्थायी व्यापारिक ढांचे के निर्माण पर भी केंद्रित होगी। साथ ही, ट्रंप ने यह भी खुलासा किया कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस वर्ष के अंत तक वॉशिंगटन का दौरा कर सकते हैं, जिससे दोनों देशों के बीच ‘स्टेट विजिट’ का दौर फिर शुरू होने की उम्मीद है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का बड़ा झटका: टैरिफ नीति अवैध घोषित
चीन दौरे की तैयारियों के बीच, डोनाल्ड ट्रंप को घरेलू मोर्चे पर एक बड़ी कानूनी बाधा का सामना करना पड़ा है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए ‘यूनिवर्सल ग्लोबल टैरिफ’ को असंवैधानिक और गैरकानूनी करार दिया है। चीफ जस्टिस जॉन रॉबर्ट्स के नेतृत्व वाली 6-3 की बेंच ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ने ‘इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट’ (IEEPA) की शक्तियों का अतिक्रमण किया है। अदालत का मानना है कि व्यापारिक कर लगाने का प्राथमिक अधिकार अमेरिकी कांग्रेस के पास है और इसे राष्ट्रीय आपातकाल की आड़ में राष्ट्रपति द्वारा नहीं थोपा जा सकता।
वैश्विक व्यापार पर प्रभाव: क्या अब बदलेगी ट्रंप की रणनीति?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने ट्रंप के प्रमुख आर्थिक हथियार यानी ‘टैरिफ’ की धार को कुंद कर दिया है। सत्ता में लौटने के बाद ट्रंप ने स्टील, एल्युमीनियम और ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भारी आयात शुल्क लगाने की नीति अपनाई थी। अब जबकि उच्चतम न्यायालय ने उनके इस कदम को वैधानिक आधार पर खारिज कर दिया है, तो वैश्विक बाजारों ने राहत की सांस ली है। हालांकि, कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस अदालती झटके के कारण बीजिंग में शी जिनपिंग के खिलाफ ट्रंप की मोलभाव करने की शक्ति (Bargaining Power) थोड़ी कमजोर पड़ सकती है।
आगामी चुनौती: कूटनीतिक रास्तों से आर्थिक मजबूती की तलाश
अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर हैं कि ट्रंप बीजिंग वार्ता में किस रणनीति के साथ उतरेंगे। टैरिफ पर लगे कानूनी अंकुश के बाद, अब यह लगभग तय है कि ट्रंप प्रशासन को व्यापारिक समझौतों के लिए कूटनीतिक समझौतों और प्रत्यक्ष वार्ताओं पर अधिक निर्भर रहना होगा। शी जिनपिंग के साथ उनकी यह मुलाकात न केवल अमेरिका और चीन के भविष्य को तय करेगी, बल्कि यह भी स्पष्ट करेगी कि वैश्विक व्यापार व्यवस्था में ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति कानूनी अड़चनों के बावजूद किस तरह आगे बढ़ती है।









