पूर्ण शराबबंदी पर सरकार लेगी बड़ा फैसला

पूर्णिया. बिहार विधानमंडल के बजट सत्र के बीच सदन की दहलीज पर शराबबंदी को लेकर जबरदस्त घमासान देखने को मिला. इस मुद्दे पर न केवल राजद और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल हमलावर थे, बल्कि एनडीए के साथी दल रालोमो और लोजपा के सुर भी बदले-बदले नजर आए. जहां एक ओर विपक्ष ने इसे ‘कागजी शराबबंदी’ करार दिया, वहीं नीतीश सरकार के दिग्गज मंत्रियों ने मोर्चा संभालते हुए यह साफ कर दिया कि शराबबंदी केवल एक कानून नहीं, बल्कि जनता का अटूट जनादेश है. सदन से बाहर शराबबंदी पर सियासी संग्राम शराबबंदी से राज्य के राजस्व पर पड़ने वाले असर को

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Published On :

फ़रवरी 25, 2026

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पूर्णिया.

बिहार विधानमंडल के बजट सत्र के बीच सदन की दहलीज पर शराबबंदी को लेकर जबरदस्त घमासान देखने को मिला. इस मुद्दे पर न केवल राजद और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल हमलावर थे, बल्कि एनडीए के साथी दल रालोमो और लोजपा के सुर भी बदले-बदले नजर आए. जहां एक ओर विपक्ष ने इसे ‘कागजी शराबबंदी’ करार दिया, वहीं नीतीश सरकार के दिग्गज मंत्रियों ने मोर्चा संभालते हुए यह साफ कर दिया कि शराबबंदी केवल एक कानून नहीं, बल्कि जनता का अटूट जनादेश है.

सदन से बाहर शराबबंदी पर सियासी संग्राम
शराबबंदी से राज्य के राजस्व पर पड़ने वाले असर को लेकर जब सवाल उठे, तो संसदीय कार्य मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि जब बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई थी, उसी समय सरकार ने संभावित राजस्व हानि का पूरा आकलन कर लिया था. इस फैसले के बाद राज्य में कई चुनाव हुए और हर बार जनता ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीति पर भरोसा जताया.जब जनता लगातार जनादेश दे रही है तो समीक्षा की मांग राजनीतिक बयानबाजी से अधिक कुछ नहीं, क्योंकि लोकतंत्र में जनता का भरोसा ही सबसे बड़ी कसौटी होता है. शराबबंदी पर जारी बहस के बीच ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायकों पर निशाना साधते हुए कहा कि जो नेता आज शराबबंदी पर सवाल उठा रहे हैं, उन्हें शायद अपनी ही पार्टी के सिद्धांतों की जानकारी नहीं है. चौधरी ने तंज कसते हुए याद दिलाया कि कांग्रेस की सदस्यता लेने की मूल शर्तों में ही शराब न पीने का संकल्प शामिल रहा है.

सर्वदलीय निर्णय पर सवाल क्यों
राजनीतिक गलियारों में हलचल तब बढ़ गई जब एनडीए के घटक दल रालोमो के विधायक माधव आनंद ने खुले तौर पर शराबबंदी की समीक्षा की मांग कर दी. उन्होंने इसे जनहित का मामला बताते हुए कानून में लचीलापन लाने की वकालत की. इस पर जदयू के मुख्य प्रवक्ता नीरज कुमार ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि शराबबंदी कोई एक दल का फैसला नहीं था, बल्कि सर्वदलीय सहमति से लिया गया निर्णय था.

पुलिस की साठगांठ और कागज पर पाबंदी के आरोप
विपक्ष की ओर से एआइएमआइएम के विधायक तौसीफ आलम और कांग्रेस के मनोज विश्वास ने सरकार को जमकर घेरा. तौसीफ आलम ने तो यहां तक चुनौती दे डाली कि पुलिस की मिलीभगत से घर-घर शराब बिक रही है और वे खुद सरकार को इसकी जगह दिखा सकते हैं. सत्ता पक्ष इसे सामाजिक सुधार का प्रतीक बता रहा है, जबकि विपक्ष और कुछ सहयोगी दल इसके क्रियान्वयन और प्रभावशीलता पर सवाल उठा रहे हैं. ऐसे में साफ है कि बिहार में शराबबंदी अब केवल कानून नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक विमर्श बन चुकी है.

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