मुंबई मेयर चुनाव में फडणवीस सरकार का बड़ा कदम, बदला चुनावी परिदृश्य

मुंबई  मुंबई मेयर पद के चुनाव को लेकर सियासी घमासान के बीच एक बड़ा मोड़ सामने आया है. बीएमसी चुनाव में मामूली बहुमत वाली महायुति सरकार ने ऐसा कदम उठाया है, जिसे ठाकरे गुट की रणनीति पर सीधा वार माना जा रहा है. दरअसल शिवसेना (यूबीटी) गुट के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पिछले दिनों कहा कहा था कि ‘अगर भगवान की इच्छा होगी तो महापौर भी अपना होगा.’ हालांकि, उनके इस बयान के बाद बीजेपी और शिंदे गुट अलर्ट मोड में आ गया और इस ताजा कदम को उसी से जोड़कर देखा जा रहा है. मुंबई महानगरपालिका की सत्ता की

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Published On :

जनवरी 26, 2026

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मुंबई 
मुंबई मेयर पद के चुनाव को लेकर सियासी घमासान के बीच एक बड़ा मोड़ सामने आया है. बीएमसी चुनाव में मामूली बहुमत वाली महायुति सरकार ने ऐसा कदम उठाया है, जिसे ठाकरे गुट की रणनीति पर सीधा वार माना जा रहा है. दरअसल शिवसेना (यूबीटी) गुट के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पिछले दिनों कहा कहा था कि ‘अगर भगवान की इच्छा होगी तो महापौर भी अपना होगा.’ हालांकि, उनके इस बयान के बाद बीजेपी और शिंदे गुट अलर्ट मोड में आ गया और इस ताजा कदम को उसी से जोड़कर देखा जा रहा है.

मुंबई महानगरपालिका की सत्ता की लड़ाई में राज्य सरकार ने एक अहम राजनीतिक चाल चली है. आगामी मेयर चुनाव की प्रक्रिया में ‘पीठासीन अधिकारी’ (Presiding Officer) की नियुक्ति से जुड़े पुराने नियम में बदलाव कर दिया गया है. नई अधिसूचना के मुताबिक अब महापौर चुनाव से जुड़ी पूरी प्रक्रिया का संचालन नगर आयुक्त या सचिव स्तर के अधिकारी करेंगे. सरकार के इस फैसले के बाद सत्ताधारी और विपक्ष के बीच पहले ही दिन टकराव के संकेत मिल रहे हैं.

अब तक की परंपरा के अनुसार, नई नगर परिषद की पहली बैठक में मेयर के चयन तक कार्यवाही देखने के लिए पीठासीन अधिकारी की नियुक्ति होती थी. यह जिम्मेदारी या तो निवर्तमान महापौर को या फिर सदन के सबसे वरिष्ठ नगरसेवक को सौंपी जाती थी.

मुंबई महापालिका का कार्यकाल समाप्त हुए करीब तीन साल हो चुके हैं, ऐसे में निवर्तमान महापौर का विकल्प पहले ही खत्म हो गया था. पुराने नियमों के तहत, उद्धव ठाकरे गुट की वरिष्ठ नगरसेविका श्रद्धा जाधव को पीठासीन अधिकारी बनने का मौका मिल सकता था. राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर पीठासीन अधिकारी विपक्ष का होता, तो सत्ताधारियों को तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता था. इसी संभावित स्थिति से बचने के लिए सरकार ने नियमों में बदलाव किया है.

राज्य सरकार की तरफ से जारी नई नियमावली के अनुसार, अब महापौर या उपमहापौर के चुनाव के लिए बुलाई जाने वाली विशेष बैठक की अध्यक्षता राज्य सरकार के सचिव स्तर या उससे ऊचे अधिकारी करेंगे. वर्तमान नगर आयुक्त भूषण गगराणी प्रधान सचिव स्तर के अधिकारी हैं, ऐसे में वही इस प्रक्रिया के पीठासीन अधिकारी होंगे. इसके साथ ही महापौर के अधिकार भी सीमित कर दिए गए हैं. नए चुने गए महापौर भी उपमहापौर के चुनाव के दौरान पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्य नहीं कर सकेंगे.

गौरतलब है कि वर्ष 1997 से मुंबई महापालिका में शिवसेना-भाजपा की सत्ता रही है और इस दौरान पीठासीन अधिकारी को लेकर कभी विवाद नहीं हुआ. लेकिन मौजूदा बदले हुए राजनीतिक समीकरणों में यह मुद्दा विवाद की जड़ बनता नजर आ रहा है. ठाकरे गुट की ओर से पीठासीन अधिकारी अपने पक्ष का हो, इसके लिए रणनीति बनाई जा रही थी, लेकिन सरकार की अधिसूचना ने इस योजना को झटका दे दिया है. ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि महापौर चुनाव के पहले ही दिन नए नियमों को लेकर सदन में जोरदार हंगामा देखने को मिल सकता है.

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