Supreme Court Verdict Consensual Relationship: भारतीय न्यायपालिका ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपसी रिश्तों की कानूनी स्थिति पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रगतिशील रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि दो बालिग (अविवाहित वयस्क) यदि आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं, तो इसे किसी भी पक्ष के चरित्र पर काला धब्बा या ‘नैतिक पतन’ नहीं माना जा सकता। जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने अपने फैसले में समाज की रूढ़िवादी सोच को चुनौती देते हुए कहा कि आपसी सहमति से बने रिश्तों को किसी व्यक्ति के चरित्र का पैमाना बनाना पूरी तरह गलत और तर्कहीन है।
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हर असफल रिश्ता ‘धोखा’ नहीं होता
अदालत ने अपनी टिप्पणी में रिश्तों के सामाजिक और कानूनी पहलुओं को गहराई से रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि यह एक कड़वा सच है कि हर रिश्ता शादी के मुकाम तक नहीं पहुंचता। अक्सर लोग इसे ‘धोखा’ मान लेते हैं, लेकिन कानून के नजरिए से यदि कोई रिश्ता शादी में नहीं बदल पाया, तो इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि एक पक्ष ने दूसरे के साथ विश्वासघात किया है। कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो दो बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद के आधार पर आपसी सहमति से रिश्ता रखने से रोकता हो। यह फैसला व्यक्तिगत निजता और चयन की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है।
समझौता करने का अर्थ ‘जुर्म स्वीकार करना’ नहीं
अदालत ने कानूनी प्रक्रिया से जुड़े एक अहम बिंदु पर भी स्पष्टता दी। अक्सर रेप या अन्य आपराधिक मामलों में पक्षकार लोक अदालत या किसी अन्य मंच पर आपसी सहमति से समझौता कर लेते हैं। कोर्ट ने साफ किया कि लोक अदालत में हुए ऐसे किसी भी समझौते का अर्थ यह नहीं है कि आरोपी ने अपना जुर्म कबूल कर लिया है। जब तक किसी सक्षम अदालत में अपराध पूरी तरह साबित नहीं हो जाता, तब तक कानून आरोपी को ‘निर्दोष’ ही मानता है। नियोक्ता (Employer) ऐसे समझौतों के आधार पर किसी उम्मीदवार को नौकरी देने से मना नहीं कर सकते या उनके खिलाफ पूर्वाग्रह (Prejudice) नहीं रख सकते।
क्या था पूरा मामला?
यह कानूनी व्याख्या तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड से संबंधित एक मामले के दौरान सामने आई। एक अभ्यर्थी का चयन पुलिस कांस्टेबल के पद पर हुआ था, लेकिन बोर्ड ने उसे ‘नैतिक पतन’ का हवाला देकर अयोग्य घोषित कर दिया। दरअसल, वर्ष 2014 में उस उम्मीदवार के खिलाफ ‘शादी का झांसा देकर बलात्कार’ का मामला दर्ज हुआ था। बाद में पता चला कि यह एक असफल प्रेम संबंध था, जो 2015 में ही लोक अदालत में आपसी सुलह से खत्म हो चुका था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए उम्मीदवार की बहाली का मार्ग प्रशस्त किया। सर्वोच्च अदालत का यह निर्णय न केवल उस युवा को न्याय दिलाने वाला है, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है जो अतीत के असफल रिश्तों के कारण अपने करियर और सामाजिक प्रतिष्ठा पर उठने वाले सवालों से जूझ रहे हैं। यह स्पष्ट है कि कानून अब व्यक्ति के निजी जीवन और उसके पेशेवर करियर के बीच एक स्पष्ट रेखा खींच रहा है।
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