सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: पाकिस्तान से आए हिंदुओं को मिले गरिमापूर्ण जीवन की जगह

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान से भारत आए अनुसूचित जाति के हिंदुओं की दुर्दशा पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने इन लोगों को नागरिकता दी तो उन्हें गरिमापूर्ण तरीके से रहने की जगह भी उपलब्ध करानी चाहिए। यह टिप्पणी दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रहने वाले इन शरणार्थियों के विस्थापन के खतरे के बीच आई है, जहां सिग्नेचर ब्रिज के पास उनका कैंप है। दरअसल, ये लोग पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न से बचकर भारत आए थे। ज्यादातर अनुसूचित जाति के हिंदू हैं और यहां झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं। कइयों को नागरिकता

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Published On :

फ़रवरी 2, 2026

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नई दिल्ली 

सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान से भारत आए अनुसूचित जाति के हिंदुओं की दुर्दशा पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि जब सरकार ने इन लोगों को नागरिकता दी तो उन्हें गरिमापूर्ण तरीके से रहने की जगह भी उपलब्ध करानी चाहिए। यह टिप्पणी दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रहने वाले इन शरणार्थियों के विस्थापन के खतरे के बीच आई है, जहां सिग्नेचर ब्रिज के पास उनका कैंप है। दरअसल, ये लोग पाकिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न से बचकर भारत आए थे। ज्यादातर अनुसूचित जाति के हिंदू हैं और यहां झुग्गी-झोपड़ी में रहते हैं। कइयों को नागरिकता मिल चुकी है, जबकि कुछ के आवेदन प्रक्रिया में हैं। दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (डीडीए) और अन्य एजेंसियां यमुना फ्लडप्लेन पर अवैध कब्जे के नाम पर उन्हें हटाने की तैयारी कर रही थीं। दिल्ली हाईकोर्ट ने मई 2025 में एक फैसले में हटाने का रास्ता साफ किया था, जिसके खिलाफ ये लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने केंद्र सरकार और डीडीए को नोटिस जारी किया और चार हफ्तों के अंदर जवाब मांग लिया। साथ ही, कोर्ट ने फिलहाल इन लोगों को विस्थापित करने की किसी भी योजना पर रोक लगा दी है।
पीठ ने स्पष्ट कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार में सिर्फ नागरिकता काफी नहीं है, बल्कि आश्रय और सम्मानजनक जीवन भी शामिल है। कोर्ट ने सरकार से पूछा कि नागरिकता देने के बाद इन्हें वैकल्पिक आवास या पुनर्वास क्यों नहीं दिया जा रहा।
यहां करीब 250-260 परिवार (लगभग 800-1200 लोग) रहते हैं। ज्यादातर मजदूरी, घरेलू काम या छोटे-मोटे काम करके गुजारा करते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान में उन्हें 'काफिर' कहा जाता था। भारत आने पर शुरुआत में संदेह झेलना पड़ा। लेकिन, अब नागरिकता मिलने के बाद भी बेघर होने का डर सता रहा है।

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