Supreme Court: भारतीय न्यायिक व्यवस्था में वैवाहिक विवादों और आपसी कलह से जुड़े मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का एक बेहद महत्वपूर्ण और स्पष्ट फैसला सामने आया है। शीर्ष अदालत ने लंबे समय से अलग रह रहे एक दंपती के मामले में सुनवाई करते हुए तलाक की डिक्री को मंजूरी दे दी है। कोर्ट ने यह कड़ा रुख अपनाते हुए माना है कि यदि पति-पत्नी लंबे समय से एक-दूसरे से अलग रह रहे हैं और वैवाहिक रिश्ते में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची है, तो ऐसे बंधन को जबरन बनाए रखना न्याय के उद्देश्यों को पूरा नहीं करता है। इस मामले में बेंच ने महिला को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में 7 लाख रुपए का भुगतान करने का भी आदेश दिया है।
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शैक्षणिक योग्यता को लेकर उपजा विवाद और मानसिक क्रूरता
यह पूरा कानूनी विवाद जून 2003 में हुए एक विवाह से जुड़ा हुआ है। शादी के शुरुआती दिनों से ही पति-पत्नी के बीच खटास आनी शुरू हो गई थी। कोर्ट ने अपने आदेश में इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया है कि शादी के तुरंत बाद ही पत्नी अपने पति की शैक्षणिक योग्यता को लेकर उससे मानसिक रूप से दूर होने लगी थी। स्थिति तब और बदतर हो गई जब उसने अपने पति को ‘अनपढ़ और गंवार’ कहकर सार्वजनिक और व्यक्तिगत रूप से अपमानित करना शुरू कर दिया। लगातार मिलने वाले इस मानसिक आघात और तिरस्कार के चलते दोनों के बीच दूरियां बढ़ती चली गईं। आखिरकार, नवंबर 2005 में पत्नी अपने मायके चली गई और उसके बाद से दोनों ने कभी साथ जीवन नहीं बिताया। इस मानसिक क्रूरता और परित्याग से तंग आकर पति ने जून 2007 में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया और तलाक की याचिका दायर की।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती
इस कानूनी लड़ाई के दौरान निचली अदालत से लेकर उच्च न्यायालय तक के सफर में पति को कई मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ा। पति ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट का मानना था कि पति अपनी पत्नी द्वारा किए गए परित्याग और मानसिक क्रूरता को कानूनी रूप से साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है, इसलिए उसे तलाक नहीं दिया जा सकता। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस चंद्रशेखर की बेंच ने इस मामले की गहराई से समीक्षा की और पाया कि ट्रायल कोर्ट के स्तर पर यह पुख्ता तौर पर साबित हो चुका था कि दोनों पक्ष दिसंबर 2005 से लगातार अलग रह रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट का यह निष्कर्ष पूरी तरह गलत था कि पत्नी का पति को हमेशा के लिए छोड़ने का कोई इरादा नहीं था।
लंबी जुदाई और सुलह की विफलता के आधार पर मुहर
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में पिछले कई न्यायिक दृष्टांतों का हवाला देते हुए कहा कि हालांकि भारतीय पारिवारिक कानूनों का मुख्य उद्देश्य पवित्र वैवाहिक बंधन का संरक्षण करना है, लेकिन जब स्थितियां ऐसी हो जाएं जहां पक्षकार लंबे समय से अलग रह रहे हों, तो कानून को ज़मीनी सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह बात साफ तौर पर सामने आई कि पति अपनी पत्नी को वापस ससुराल लाने के लिए गया था, लेकिन पत्नी ने बिना किसी ठोस या वैध वजह के उसके साथ जाने से साफ इनकार कर दिया था। इसके अलावा, इस पूरी शादी से कोई संतान भी नहीं हुई थी और दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की तमाम कोशिशें पूरी तरह विफल साबित हो चुकी थीं। इन सभी ठोस परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, शीर्ष अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि प्रतिवादी पत्नी ने अपनी इच्छा से इस वैवाहिक रिश्ते को पूरी तरह खत्म कर दिया था और पति ने कानून के तहत परित्याग के आधार को सफलतापूर्वक साबित कर दिखाया है।
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