Supreme Court on Pawan Khera: कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने आज यानी 15 अप्रैल बुधवार को तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी गई थी। अदालत के इस रुख के बाद अब पवन खेड़ा पर गिरफ्तारी का खतरा मंडराने लगा है। यह मामला असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनकी भुइयां के खिलाफ दिए गए आपत्तिजनक बयानों और आरोपों से जुड़ा है।
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हाईकोर्ट के फैसले पर रोक और ‘फोरम शॉपिंग’ का आरोप
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस चंदुरकर की पीठ ने असम सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। 10 अप्रैल को तेलंगाना हाईकोर्ट ने खेड़ा को राहत दी थी, जिसे अब रद्द कर दिया गया है। असम सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में दलील दी कि जब घटना असम में हुई और FIR भी असम (गुवाहाटी क्राइम ब्रांच) में दर्ज है, तो तेलंगाना हाईकोर्ट ने जमानत कैसे दे दी?
मेहता ने इसे ‘फोरम शॉपिंग’ और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह जमानत के लिए असम की संबंधित अदालत में क्यों नहीं जा सकते।
असम के मुख्यमंत्री की पत्नी से जुड़ा विवाद
यह पूरा कानूनी विवाद पवन खेड़ा द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों से शुरू हुआ। खेड़ा ने दावा किया था कि असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी रिनकी भुइयां के पास तीन अलग-अलग देशों के पासपोर्ट हैं। उन्होंने इसे स्वतंत्र भारत की राजनीति का सबसे बड़ा खुलासा करार दिया था।
इन आरोपों पर पलटवार करते हुए सीएम हिमंता ने इन्हें पूरी तरह मनगढ़ंत और दुर्भावनापूर्ण बताया। इसके बाद रिनकी भुइयां ने खेड़ा के खिलाफ आपराधिक और दीवानी मानहानि का मामला दर्ज कराया। जब असम पुलिस कार्रवाई के लिए खेड़ा के आवास पर पहुंची, तो वे वहां नहीं मिले थे।
गिरफ्तारी से कोई संरक्षण नहीं, लेकिन असम कोर्ट का विकल्प खुला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि पवन खेड़ा को फिलहाल गिरफ्तारी से कोई सुरक्षा (Protection) नहीं दी जा सकती। हालांकि, अदालत ने उन्हें एक कानूनी रास्ता भी दिखाया है, “पवन खेड़ा असम की संबंधित निचली अदालत में अग्रिम जमानत के लिए अर्जी दाखिल कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का उस सुनवाई पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।” इसका सीधा अर्थ यह है कि खेड़ा को अब राहत पाने के लिए असम के अधिकार क्षेत्र वाली अदालत में ही शरण लेनी होगी।









