बैसाखी पर खास आयोजन: गुरुद्वारा भगत धन्ना जी में पहली बार महोत्सव, भारी भीड़

चंडीगढ़. बैसाखी और खालसा पंथ के स्थापना दिवस के पावन अवसर पर सोमवार को पटियाला के गांव लाछड़ू खुर्द (घन्नौर) में एक नई परंपरा का आगाज हुआ। यहां स्थित गुरुद्वारा साहिब भगत धन्ना जी में पहली बार भव्य बैसाखी महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें घन्नौर और आसपास के इलाकों से हजारों की संख्या में पहुंची संगत ने अपनी हाजिरी दर्ज करवाई। पूरा वातावरण 'जो बोले सो निहाल' के जयकारों और गुरबाणी के स्वर से आध्यात्मिक रंग में रंगा नजर आया। खालसा पंथ के स्थापना दिवस को समर्पित इस विशेष समागम में पंथ के प्रसिद्ध रागी और ढाडी जत्थों ने

Wrriten By :

Editor

Published On :

अप्रैल 14, 2026

Advertisements
728x90 Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital.jpg

चंडीगढ़.

बैसाखी और खालसा पंथ के स्थापना दिवस के पावन अवसर पर सोमवार को पटियाला के गांव लाछड़ू खुर्द (घन्नौर) में एक नई परंपरा का आगाज हुआ। यहां स्थित गुरुद्वारा साहिब भगत धन्ना जी में पहली बार भव्य बैसाखी महोत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें घन्नौर और आसपास के इलाकों से हजारों की संख्या में पहुंची संगत ने अपनी हाजिरी दर्ज करवाई।

पूरा वातावरण 'जो बोले सो निहाल' के जयकारों और गुरबाणी के स्वर से आध्यात्मिक रंग में रंगा नजर आया। खालसा पंथ के स्थापना दिवस को समर्पित इस विशेष समागम में पंथ के प्रसिद्ध रागी और ढाडी जत्थों ने हाजिरी भरी। इंटरनेशनल पंथक ढाडी जत्थे के ज्ञानी लखविंदर सिंह रजौली (अंबाला) ने जोश भरे अंदाज में खालसा पंथ के गौरवशाली इतिहास को संगत के साथ साझा किया। वहीं, श्री दरबार साहिब अमृतसर के हजूरी रागी भाई शुभदीप सिंह ने मधुर गुरबाणी कीर्तन के माध्यम से श्रद्धालुओं को गुरु चरणों से जोड़ा। विभिन्न रागी जत्थों द्वारा प्रस्तुत कीर्तन ने वहां मौजूद संगत को मंत्रमुग्ध कर दिया।

सेवा और प्रबंधन का दिखा अनूठा संगम
महोत्सव की सफलता के पीछे समाजसेवी भगत सिंह और उनकी टीम का विशेष योगदान रहा। पहली बार आयोजित इस बड़े स्तर के कार्यक्रम को लेकर गांव में खासा उत्साह था। भगत सिंह ने बताया कि हजारों की संख्या में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए पहले से ही पुख्ता इंतजाम किए गए थे ताकि किसी को असुविधा न हो।

समागम के दौरान गुरु का लंगर अटूट वितरित किया गया और सेवादारों ने पूरी निष्ठा के साथ अपनी सेवाएं निभाईं। कार्यक्रम के समापन पर अरदास की गई, जिसमें सरबत के भले (विश्व कल्याण) की कामना की गई। इस आयोजन ने न केवल धार्मिक बल्कि सामुदायिक सौहार्द का भी एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया।

Leave a Comment

2