Shiv Sena UBT Merger : कांग्रेस में होगा शिवसेना UBT का विलय? संजय राउत के बयान से बढ़ी हलचल

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। संजय राउत के हालिया बयान के बाद शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस के संभावित विलय को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। क्या यह सिर्फ राजनीतिक अटकल है या पर्दे के पीछे कोई बड़ी रणनीति तैयार हो रही है?

Shiv Sena UBT Merger

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

जून 18, 2026

Shiv Sena UBT Merger :  महाराष्ट्र की राजनीति में जारी सियासी उठापटक के बीच उद्धव ठाकरे गुट के 6 सांसदों के पार्टी छोड़ने और शिंदे गुट में शामिल होने का रहस्य अब पूरी तरह से खुल गया है। इन सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए जो प्रस्ताव प्रस्तुत किया है, उसमें पार्टी छोड़ने की ठोस और चौंकाने वाली वजहें बताई गई हैं। सूत्रों के अनुसार, इन सांसदों के बगावत के पीछे का मुख्य कारण विचारधारा का मतभेद और पार्टी के भविष्य को लेकर उपजी गहरी आशंकाएं हैं।

कांग्रेस में विलय की आशंका बनी बगावत का आधार

बागी सांसदों द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव में सबसे बड़ी चिंता शिवसेना (यूबीटी) के कांग्रेस में विलय को लेकर जताई गई है। सांसदों का तर्क है कि बालासाहेब ठाकरे ने जिस शिवसेना की स्थापना की थी, उसका उद्देश्य कभी भी कांग्रेस जैसी विचारधारा वाली पार्टी में विलय होना नहीं था। सांसदों ने स्पष्ट किया है कि वे पार्टी की मूल पहचान और सिद्धांतों को बचाने के लिए इस कठिन फैसले को लेने पर मजबूर हुए हैं। उनका मानना था कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में पार्टी धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्र पहचान खो रही है, जिसे वे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।

संजय राउत के बयानों से बढ़ी सांसदों की नाराजगी

बागी सांसदों के मन में संजय राउत के प्रति भी गहरा आक्रोश देखने को मिला है। प्रस्ताव में उल्लेख किया गया है कि संजय राउत द्वारा तृणमूल कांग्रेस (TMC) को कांग्रेस में विलय करने की सलाह देने से इन सांसदों के बीच हड़कंप मच गया था। उन्हें इस बात का गहरा डर सताने लगा था कि जिस तरह राउत अन्य दलों को कांग्रेस में विलय करने की सलाह दे रहे हैं, उसी तरह भविष्य में शिवसेना (यूबीटी) का अस्तित्व भी कांग्रेस में विलीन कर दिया जाएगा। इस घटनाक्रम ने नेतृत्व और सांसदों के बीच भरोसे की खाई को और अधिक चौड़ा कर दिया।

भरोसे की कमी और पार्टी नेतृत्व पर खड़े हुए सवाल

प्रस्ताव में साफतौर पर दावा किया गया है कि पार्टी के भीतर बदलते समीकरणों और विचारधारा से भटकने के कारण सांसदों का नेतृत्व से विश्वास पूरी तरह खत्म हो चुका था। टूटे हुए भरोसे का हवाला देते हुए बागी सांसदों ने कहा है कि ऐसी प्रतिकूल परिस्थितियों में पार्टी के साथ बने रहना उनके लिए संभव नहीं था। उन्होंने अपनी निष्ठा को बालासाहेब ठाकरे के आदर्शों के प्रति समर्पित बताते हुए कहा कि वे पार्टी के मूल मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए नेतृत्व से अलग होने का साहसिक निर्णय ले रहे हैं।

स्वतंत्र गुट नहीं, सीधे शिवसेना में विलय का लिया फैसला

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बागी सांसदों ने किसी तीसरे या स्वतंत्र गुट का निर्माण नहीं किया है। उन्होंने सीधे तौर पर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली ‘शिवसेना’ में अपने विलय का आधिकारिक निर्णय लिया है। मीडिया में फैलाई जा रही अलग गुट बनाने की अटकलों को खारिज करते हुए उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब पूरी तरह से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के साथ हैं। इस विलय के बाद महाराष्ट्र में शिवसेना के दोनों धड़ों के बीच की सियासी जंग अब और भी तेज होने की संभावना है।

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