UP Politics: बटुक सम्मान या सिर्फ सियासत? शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने डिप्टी सीएम के कदम को नकारा

वाराणसी के माघ मेले में वेदपाठी बटुकों के साथ हुई पुलिसिया बदसलूकी ने अब बड़े राजनीतिक और धार्मिक संग्राम का रूप ले लिया है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा 101 बटुकों के सम्मान को शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने 'दिखावा' करार देते हुए न्याय की मांग की है और 11 मार्च को लखनऊ कूच का ऐलान किया है।

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

फ़रवरी 19, 2026

UP Politics: वाराणसी के माघ मेले में वेदपाठी बटुकों के साथ हुई कथित बदसलूकी ने अब एक बड़े सियासी और धार्मिक संग्राम का रूप ले लिया है। पुलिसि कार्रवाई से शुरू हुआ यह मामला अब उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के बीच सीधी जंग बन चुका है।

UP Brahmin Politics: शंकराचार्य विवाद के बीच ब्रजेश पाठक का बड़ा कदम, 101 बटुकों के सम्मान से सियासी हलचल तेज

माघ मेले में खाकी का प्रहार

बताते चले कि, विवाद की जड़ें मौनी अमावस्या के दिन माघ मेले में हुई एक अप्रिय घटना से जुड़ी हैं। आरोप है कि सुरक्षा व्यवस्था के नाम पर पुलिसकर्मियों ने वेदपाठी बटुकों के साथ मारपीट की और उनकी धार्मिक पहचान ‘शिखा’ (चोटी) खींचकर उनका अपमान किया। इस घटना के वीडियो वायरल होने के बाद संत समाज में भारी आक्रोश फैल गया। सनातन परंपरा में शिखा को केवल केश नहीं, बल्कि धर्म का ध्वज माना जाता है, जिसके साथ हुई छेड़छाड़ को सीधे आस्था पर चोट के रूप में देखा गया।

डिप्टी सीएम की डैमेज कंट्रोल पॉलिटिक्स

मामला गरमाता देख उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इसे ‘पाप’ करार दिया और प्रायश्चित के तौर पर अपने सरकारी आवास पर 101 बटुकों को आमंत्रित किया। उन्होंने बटुकों का राजकीय सम्मान और तिलक-वंदन करते हुए शिखा के महत्व को रेखांकित किया। डिप्टी सीएम की इस पहल को पुलिस की ज्यादती के खिलाफ सरकार के ‘हीलिंग टच’ के रूप में पेश किया गया, ताकि ब्राह्मण समाज और संत वर्ग की नाराजगी को कम किया जा सके।

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के तीखे प्रहार

ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने डिप्टी सीएम की इस कवायद को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने तीखा सवाल दागते हुए कहा कि सनातन प्रतीकों का अपमान करने के बाद उन पर फूल चढ़ाना न्याय नहीं है। शंकराचार्य ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘मर्यादा’ संबंधी बयानों पर भी आपत्ति जताई और स्पष्ट किया कि गेरुआ वस्त्र धारण करने मात्र से शासन में सनातन परंपराओं का संरक्षण सुनिश्चित नहीं हो जाता। उन्होंने मांग की है कि प्रतीकात्मक सम्मान के बजाय दोषी पुलिसकर्मियों पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।

विपक्ष का पलटवार

इस विवाद में अब राजनीतिक दलों की एंट्री भी हो चुकी है। समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मेहरोत्रा ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार की ‘चेतना’ जागने में एक महीना लग गया। विपक्ष का आरोप है कि सरकार केवल चुनाव और वोट बैंक को देखते हुए धार्मिक संवेदनशीलता का ढोंग कर रही है। सपा ने इस पूरे प्रकरण की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उपमुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की है, जिससे सरकार की घेराबंदी और तेज हो गई है।

धर्म और सत्ता के बीच निर्णायक टकराव की आहट

सरकार और संतों के बीच यह गतिरोध थमता नजर नहीं आ रहा है। शंकराचार्य ने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे 11 मार्च को अपने शिष्यों और बटुकों के साथ राजधानी लखनऊ की ओर कूच करेंगे। दूसरी ओर, सरकार के मंत्रियों द्वारा शंकराचार्य की उपाधि पर सवाल उठाने से आग में घी डालने का काम हुआ है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार इस आंदोलन को रोकने के लिए कोई बड़ा कदम उठाएगी या यह टकराव यूपी की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा करेगा।

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