Samrat Choudhary: बांकीपुर की जीत से बदला PK का अंदाज, सम्राट चौधरी के बहाने किस पर साधा निशाना?

बांकीपुर उपचुनाव में जीत के बाद प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या PK का निशाना सिर्फ बिहार के मुख्यमंत्री हैं या इस अभियान के जरिए बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को भी संदेश दिया जा रहा है? जानिए इस सियासी रणनीति के पीछे की पूरी कहानी।

बांकीपुर की जीत से बदला PK का अंदाज

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

अगस्त 14, 2026

Samrat Choudhary: बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की बांकीपुर सीट पर जीत के बाद सियासी समीकरणों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। बीजेपी के पुराने गढ़ माने जाने वाले बांकीपुर में 19,324 वोटों से जीत हासिल करने के बाद प्रशांत किशोर ने इसे सिर्फ अपनी जीत नहीं, बल्कि बीजेपी के लिए एक राजनीतिक संदेश बताया।

जीत के तुरंत बाद उन्होंने ‘सम्राट हटाओ अभियान’ शुरू किया और बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को पद से हटाने की मांग उठाई। हालांकि, किशोर का कहना है कि उनकी लड़ाई सम्राट चौधरी से व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि बिहार के नेतृत्व और भविष्य की दिशा को लेकर है।

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आखिर सम्राट चौधरी ही क्यों?

प्रशांत किशोर ने सम्राट चौधरी को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उनका सबसे बड़ा आरोप कथित आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर है। किशोर का दावा है कि चौधरी पर 1990 के दशक में कुशवाहा समुदाय के सात लोगों की हत्या से जुड़ा मामला रहा है। हालांकि, ऐसे आरोपों को संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।

इसके अलावा प्रशांत किशोर ने उनकी शैक्षणिक योग्यता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका दावा है कि सम्राट चौधरी की शिक्षा और डिग्री से जुड़े दावों को लेकर विवाद है।

किशोर उनके सार्वजनिक आचरण और राजनीतिक भाषा को भी मुख्यमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप नहीं मानते। उनका कहना है कि बांकीपुर के मतदाताओं ने उनके नेतृत्व और छवि को खारिज करने का संदेश दिया है।

क्या निशाना सिर्फ सम्राट चौधरी हैं?

यहीं से बिहार की राजनीति का बड़ा सवाल सामने आता है। प्रशांत किशोर लगातार यह स्पष्ट करते रहे हैं कि उन्हें बीजेपी के खिलाफ कोई व्यक्तिगत आपत्ति नहीं है। उनका कहना है कि अगर बीजेपी कुशवाहा समाज से मुख्यमंत्री बनाना चाहती है तो उसे योग्य, ईमानदार और सक्षम नेता चुनना चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सम्राट चौधरी पर हमला बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व तक संदेश पहुंचाने की रणनीति भी हो सकता है। क्योंकि मुख्यमंत्री के रूप में उनका चयन बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व का महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला माना गया था।

किशोर अपने बयानों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का भी जिक्र करते रहे हैं। वह बांकीपुर के परिणाम को बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के लिए संदेश बताते हैं।

खुद को तीसरे विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश

प्रशांत किशोर की रणनीति का एक अहम हिस्सा बिहार में बीजेपी और आरजेडी-कांग्रेस के बीच खुद को तीसरी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करना है। सम्राट चौधरी जैसे बड़े चेहरे को निशाना बनाकर किशोर खुद को वैकल्पिक नेतृत्व के तौर पर पेश कर रहे हैं। साथ ही शिक्षा, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों को भी अपनी राजनीति के केंद्र में रख रहे हैं।

बीजेपी के लिए चुनौती और ‘नॉन-नेगोशिएबल’ मांग

किशोर का मानना है कि बांकीपुर में बीजेपी के पारंपरिक मतदाताओं ने भी बदलाव का संकेत दिया है। वह इसे पार्टी के कथित राजनीतिक अहंकार के खिलाफ जनादेश के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने सम्राट चौधरी को हटाने की मांग को अपनी ‘नॉन-नेगोशिएबल’ मांग बताया है। यानी इस मुद्दे पर पीछे हटने के बजाय वह इसे लगातार राजनीतिक अभियान के रूप में आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं।

क्या बदले जाएंगे सम्राट चौधरी?

बीजेपी की ओर से इस मांग को खारिज किया गया है। 13 अगस्त को पार्टी प्रवक्ता नीरज कुमार शर्मा ने कहा कि सिर्फ एक उपचुनाव के नतीजे के आधार पर मुख्यमंत्री बदलने की मांग हास्यास्पद है। ऐसे में फिलहाल सम्राट चौधरी के भविष्य को लेकर कोई बदलाव सामने नहीं आया है। लेकिन प्रशांत किशोर ने इस मुद्दे को बिहार की राजनीति के केंद्र में जरूर ला दिया है।

बांकीपुर के लिए किशोर के बड़े वादे

प्रशांत किशोर ने बांकीपुर की जनता से कई वादे भी किए हैं। इनमें 10 हजार युवाओं को निजी क्षेत्र में रोजगार दिलाने, 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए तीन महीने के भीतर 1,100 रुपये मासिक पेंशन की व्यवस्था कराने और शराबबंदी कानून को खत्म करने जैसे दावे शामिल हैं। उन्होंने विधायक निधि से होने वाले कार्यों में भ्रष्टाचार रोकने का भी वादा किया है।

कुल मिलाकर, ‘सम्राट हटाओ’ अभियान सिर्फ एक नेता को हटाने की मांग नहीं बल्कि बिहार में वैकल्पिक राजनीतिक पहचान बनाने की प्रशांत किशोर की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह अभियान राज्य की सियासत को किस दिशा में ले जाता है, इस पर सभी की नजरें रहेंगी।

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