Sambhal News: उत्तर प्रदेश के संभल जिले से एक बेहद चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जहां कानून के डर और प्रशासनिक सख्ती के कारण मुस्लिम समुदाय के लोगों ने स्वयं उस मस्जिद को अपने हाथों से तोड़ दिया जिसे वे खुदा का घर मानते हैं। सलेमपुर सलार गांव में हुई इस कार्रवाई ने पूरे इलाके में चर्चा का माहौल गरमा दिया है।
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अवैध निर्माण पर चला प्रशासन का डंडा
बताते चले कि, पूरा मामला संभल के सलेमपुर सलार गांव का है, जहां लगभग 439 वर्ग मीटर सरकारी भूमि पर मस्जिद का निर्माण किया गया था। साल 2025 में जिला प्रशासन को एक औपचारिक शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसमें दावा किया गया था कि वर्ष 2005 में सार्वजनिक जमीन पर अवैध कब्जा करके इस धार्मिक स्थल को खड़ा किया गया था। शिकायत की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने तुरंत जांच शुरू की और मस्जिद कमेटी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया। सुनवाई के बाद, अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि निर्माण पूरी तरह अवैध है और इसे हटाने के आदेश जारी किए गए।
आधी रात को हथौड़ों की गूंज और जमींदोज हुआ ढांचा
आपको बता दे कि, प्रशासन ने मस्जिद कमेटी और ग्रामीणों को 3 जनवरी तक की अंतिम मोहलत दी थी। जिला प्रशासन की योजना के अनुसार, 4 जनवरी की सुबह 10 बजे तहसीलदार धीरेंद्र प्रताप सिंह के नेतृत्व में एक विशाल टीम को मौके पर पहुंचना था। जैसे ही ग्रामीणों को अहसास हुआ कि सुबह पीला पंजा (बुलडोजर) चलेगा, उन्होंने रात के अंधेरे में ही खुद मस्जिद को तोड़ना शुरू कर दिया। जब सुबह प्रशासनिक अधिकारी और पुलिस बल गांव पहुंचे, तो वहां मस्जिद का नामोनिशान मिट चुका था और केवल मलबे के ढेर शेष थे।
भारी पुलिस बल की तैनाती और सुरक्षा के कड़े इंतजाम
इस ध्वस्तीकरण अभियान को सफल बनाने के लिए प्रशासन ने हाई-लेवल तैयारी की थी। सुरक्षा के मद्देनजर कई थानों की पुलिस, पीएसी (PAC) और आरआरएफ (RRF) की कंपनियों को तैनात किया गया था। इसके साथ ही लेखपाल और कानूनगो की टीम भी मौके पर मौजूद थी। मस्जिद को गिराने के लिए तीन बुलडोजर स्टैंडबाय पर रखे गए थे। तहसीलदार का मानना है कि प्रशासन के इसी कड़े रुख और भारी बल की मौजूदगी को भांपते हुए कब्जा करने वालों ने हार मान ली और बुलडोजर चलने से पहले ही स्वतः ढांचा हटा लिया।
गांव में पसरा सन्नाटा और मीडिया से बनाई दूरी
इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद सलेमपुर सलार गांव के लोग अब पूरी तरह खामोश हैं। मस्जिद को खुद ही ढहाने के बाद से गांव का कोई भी व्यक्ति मीडिया के सामने आकर बयान देने को तैयार नहीं है। हालांकि, प्रशासनिक गलियारों में इसे कानून की जीत के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि सार्वजनिक भूमि को मुक्त कराना प्राथमिकता थी, और ग्रामीणों द्वारा खुद ही अतिक्रमण हटा लेने से स्थिति शांतिपूर्ण बनी रही।










