Sabarimala Case: केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज पर है। मंगलवार से सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई शुरू कर दी है। केंद्र सरकार ने इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि अदालतों को धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं के बीच हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
केंद्र सरकार का हलफनामा
बताते चले कि, सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना आधिकारिक हलफनामा पेश किया। सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि मासिक धर्म वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाना चाहिए। केंद्र का तर्क है कि भगवान अय्यप्पा ‘नित्य ब्रह्मचारी’ हैं और उनके विमुख रहने की प्रकृति ही इस मंदिर की आधारशिला है। सरकार के अनुसार, अय्यप्पा भक्त एक विशिष्ट संप्रदाय का हिस्सा हैं जिनकी अपनी धार्मिक स्वायत्तता है, और अदालतें आस्था या विश्वास के विषयों पर फैसला सुनाने का अधिकार नहीं रखतीं।
2018 के फैसले पर पुनर्विचार का समर्थन
केंद्र सरकार ने साल 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले पर फिर से विचार करने का समर्थन किया है, जिसमें सभी आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी। सरकार का मानना है कि यह मामला केवल लैंगिक समानता (Gender Equality) का नहीं है, बल्कि यह गहरी धार्मिक आस्था और परंपराओं से जुड़ा हुआ है। केंद्र ने अपनी दलील में कहा कि न्यायपालिका को किसी धर्म की ‘आवश्यक धार्मिक प्रथाओं’ (Essential Religious Practices) या देवता के विशिष्ट गुणों की पुनर्व्याख्या करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह समुदायों के निजी विश्वास का हिस्सा है।
न्यायिक समीक्षा की सीमाएं
सरकार ने कोर्ट में यह भी दलील दी कि न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की अपनी सीमाएं होनी चाहिए। केंद्र का कहना है कि अदालतों को संवैधानिक सिद्धांतों का सम्मान तो करना चाहिए, लेकिन धार्मिक मानदंडों और नियमों को संबंधित समुदायों के विवेक पर ही छोड़ देना चाहिए। केंद्र के अनुसार, किसी विशेष मंदिर की परंपराओं को आधुनिक सामाजिक मानकों पर तौलना उचित नहीं है, खासकर तब जब वे परंपराएं उस धर्म के मूल दर्शन का हिस्सा हों। अब 9 जजों की पीठ को यह तय करना है कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिलने वाली धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच क्या संतुलन होगा।










