Sabarimala Case: ‘अंधविश्वास की जांच कर सकती है अदालत’, सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक प्रथाओं पर सुनाया बड़ा फैसला

सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह धार्मिक प्रथाओं के 'अंधविश्वास' होने की जांच करने का अधिकार रखता है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि सती या जादू-टोना जैसी कुरीतियों पर अदालत मूकदर्शक नहीं रह सकती। यह फैसला धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच एक नई बहस को जन्म देता है।

Sabarimala Case

Wrriten By :

Aanchal Singh

Published On :

अप्रैल 8, 2026

Sabarimala Case: सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे कानूनी संग्राम में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका को यह परखने का पूर्ण अधिकार है कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं। कोर्ट ने साफ कहा कि इस मामले में संसद का एकाधिकार नहीं है और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अदालत का हस्तक्षेप अनिवार्य है। यह सुनवाई महिलाओं के समानता के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच चल रही लंबी बहस को एक नया मोड़ दे रही है।

न्यायपालिका के अधिकार और धार्मिक कुरीतियों के विरुद्ध संवैधानिक हस्तक्षेप

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में जोर देकर कहा कि अदालत केवल एक मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती। पीठ ने तर्क दिया कि यदि कोई प्रथा समाज को झकझोरती है या मौलिक अधिकारों का हनन करती है, तो न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का अधिकार सर्वोच्च है। कोर्ट ने सती प्रथा, जादू-टोना और नरभक्षण जैसे उदाहरण देते हुए समझाया कि धर्म के नाम पर अमानवीय कृत्यों को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। जजों ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के आधार पर किसी भी ‘अंधविश्वास’ को चुनौती दी जा सकती है।

धार्मिक ज्ञान और धर्मनिरपेक्ष अदालत की भूमिका पर बहस

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सरकार का पक्ष रखते हुए तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत (Secular Court) को धार्मिक बारीकियों का विशेषज्ञ ज्ञान नहीं होता, इसलिए वह यह तय नहीं कर सकती कि क्या अंधविश्वास है और क्या नहीं। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक समाज की मान्यता दूसरे के लिए अंधविश्वास हो सकती है। हालांकि, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस एमएम सुंदरेश ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि कोई प्रथा सार्वजनिक स्वास्थ्य या नैतिकता को नुकसान पहुँचाती है, तो सरकार यह नहीं कह सकती कि अदालत के पास अधिकार नहीं है।

‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ की कसौटी और सामाजिक नैतिकता

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने एक महत्वपूर्ण बिंदु उठाते हुए कहा कि किसी भी प्रथा की जांच उस धर्म की मूल परंपरा के आधार पर होनी चाहिए। अदालत को यह देखना होगा कि क्या वह प्रथा धर्म का अभिन्न अंग है या महज एक रूढ़ि। कोर्ट ने माना कि किसी दूसरे धर्म के नजरिए से परंपराओं को नहीं तौला जा सकता, लेकिन हर धार्मिक मान्यता को ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (Public Order) के दायरे में रहना होगा। मुख्य न्यायाधीश ने भी सहमति जताई कि नरबलि या जादू-टोना जैसे जघन्य कृत्यों के मामले में अदालत को विशेषज्ञता की जरूरत नहीं, वह सीधे हस्तक्षेप कर सकती है।

क्या है सरकार का तर्क?

सरकार ने सबरीमला मंदिर की विशिष्टता का बचाव करते हुए कहा कि 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक भेदभावपूर्ण नहीं है। यह प्रतिबंध भगवान अयप्पा के ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ (Naisthika Brahmachari) स्वरूप की धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा है। सरकार का तर्क है कि हर परंपरा को केवल ‘समानता’ के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि धर्म की अपनी विशिष्टता का सम्मान होना चाहिए। यह मामला अब इस नाजुक संतुलन पर टिका है कि व्यक्तिगत अधिकार बड़े हैं या सदियों पुरानी धार्मिक आस्था।