Ravidas Jayanti 2026: रविदास जयंती हर साल माघ पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है और वर्ष 2026 में यह पर्व 1 फरवरी, रविवार को मनाया जाएगा। इस साल यह संत रविदास जी की 649वीं जयंती है। संत, समाज सुधारक और कवि गुरु रविदास जी ने अपने जीवन का उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना और समानता का संदेश फैलाना बनाया। उनका मानना था कि ईश्वर द्वारा बनाए गए सभी लोग, चाहे अमीर हों या गरीब, समान हैं। गुरु रविदास जी हमेशा जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे रहते थे और भक्ति, प्रेम और करुणा के माध्यम से समाज में एकता का संदेश देते थे।
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वाराणसी में रविदास जयंती का खास महत्व

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में रविदास जयंती बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इस अवसर पर दूर-दूर से श्रद्धालु वाराणसी पहुंचते हैं। गुरु रविदास जी की तस्वीरों और उनके विचारों के साथ शोभायात्राएं निकाली जाती हैं। मंदिरों में उनकी आरती होती है और उनके भजनों तथा पदों का गायन किया जाता है। यह पर्व न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता और एकता का संदेश भी देता है।
रविदास जयंती का इतिहास और पौराणिक मान्यता
संत रविदास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में संवत 1337 ईस्वी में माघ महीने की पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसी वजह से उनकी जयंती का पर्व माघ पूर्णिमा को मनाने की परंपरा चली आ रही है। गुरु रविदास जी ने अपने जीवन और शिक्षाओं के माध्यम से यह संदेश दिया कि सभी इंसान बराबर हैं और भक्ति का मार्ग प्रेम और करुणा से होकर जाता है। उनके विचार आज भी समाज सुधार और समानता की प्रेरणा के रूप में देखे जाते हैं।
रविदास आरती और भजन

रविदास जयंती के अवसर पर उनके भजनों और आरतियों का विशेष महत्व है। श्रद्धालु “नामु तेरो आरती भजनु मुरारे” जैसे भजनों का गायन कर उनके आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करते हैं। यह आरती उनके जीवन दर्शन और भक्ति मार्ग का प्रतीक है।
समाजिक संदेश और श्रद्धालुओं की भागीदारी
रविदास जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता, एकता और भाईचारे का संदेश भी देती है। श्रद्धालु इस दिन अपने परिवार और समाज के साथ मिलकर इसे मनाते हैं। वाराणसी में मंदिरों और गलियों में भजन-कीर्तन, शोभायात्राएं और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
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