रांची स्मार्ट सिटी घोटाला या लापरवाही? फ्लैट, अस्पताल और मॉल अब तक कागजों में

 रांची  रांची की स्मार्ट सिटी परियोजना आज अपने सबसे बड़े सवालों के घेरे में है। करीब 1500 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद न तो आम लोगों को फ्लैट मिले, न मेडिकल कॉलेज बना, न अस्पताल और न ही माल जैसे बड़े प्रोजेक्ट जमीन पर उतर सके। हालत यह है कि 656 एकड़ में फैली स्मार्ट सिटी में 70 करोड़ रुपये की लागत से मंत्रियों के आलीशान बंगले तो बन गए, लेकिन आम आदमी के हिस्से अब तक एक भी फ्लैट नहीं आया। स्मार्ट सिटी कॉरपोरेशन अब तक जमीन बेचकर 550 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर चुका है,

Wrriten By :

Editor

Published On :

मई 25, 2026

Advertisements
728x90 Uttar Pradesh Police Mission Shakti Digital.jpg

 रांची

 रांची की स्मार्ट सिटी परियोजना आज अपने सबसे बड़े सवालों के घेरे में है। करीब 1500 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद न तो आम लोगों को फ्लैट मिले, न मेडिकल कॉलेज बना, न अस्पताल और न ही माल जैसे बड़े प्रोजेक्ट जमीन पर उतर सके।

हालत यह है कि 656 एकड़ में फैली स्मार्ट सिटी में 70 करोड़ रुपये की लागत से मंत्रियों के आलीशान बंगले तो बन गए, लेकिन आम आदमी के हिस्से अब तक एक भी फ्लैट नहीं आया।

स्मार्ट सिटी कॉरपोरेशन अब तक जमीन बेचकर 550 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर चुका है, लेकिन तकनीकी उलझन, म्यूटेशन विवाद और विभागीय समन्वय की कमी ने पूरे प्रोजेक्ट की रफ्तार रोक दी है। 60 प्लाटों में महज 13 ही बिक सके हैं और पिछले दो वर्षों से प्लाट ऑक्शन भी बंद पड़ा है।

एक साल बाद भी शुरू नहीं हुआ म्यूटेशन
स्मार्ट सिटी की सबसे बड़ी बाधा जमीन का म्यूटेशन बना हुआ है। बीते साल 17 जून को मुख्य सचिव अलका तिवारी की अध्यक्षता में हुई बैठक में म्यूटेशन प्रक्रिया जल्द शुरू करने का निर्णय लिया गया था।

बैठक की प्रोसिडिंग नामकुम अंचल कार्यालय को भेजी गई, लेकिन करीब एक साल होने के हैं उसके बाद भी प्रक्रिया जमीन पर शुरू नहीं हो सकी।

म्यूटेशन नहीं, इसलिए नक्शा भी पास नहीं
स्मार्ट सिटी कारपोरेशन ने जिन कंपनियों और निवेशकों को जमीन आवंटित की, उनकी जमीन का म्यूटेशन नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से भवन निर्माण के नक्शे भी अटक गए हैं।

दो अपार्टमेंट, एक माल, मेडिकल कॉलेज और अस्पताल भवन के नक्शे स्वीकृति के लिए भेजे गए थे, लेकिन टाउन प्लानिंग विभाग ने म्यूटेशन नहीं होने का हवाला देते हुए नक्शा पास करने की आगे की प्रक्रिया रोक दी है। नतीजा यह हुआ कि हजारों करोड़ के निवेश वाली परियोजनाएं कागजों में कैद होकर रह गईं।

65 साल पुरानी गलती अब बनी सबसे बड़ा संकट
दरअसल, समस्या की जड़ 65 साल पुरानी है। संयुक्त बिहार के समय एचईसी के लिए जमीन अधिग्रहित की गई थी, लेकिन उस समय म्यूटेशन नहीं कराया गया। वर्ष 2016 में झारखंड सरकार ने एचईसी से यह जमीन खरीदी, तब भी म्यूटेशन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई।

इसके बावजूद स्मार्ट सिटी कॉरपोरेशन ने निवेशकों को प्लाट आवंटित कर दिए। अब निवेशकों की जमीन का भी म्यूटेशन नहीं हो पा रहा है और पूरा प्रोजेक्ट कानूनी व तकनीकी पेंच में फंस गया है।

निवेशकों का भरोसा भी डगमगाया
तकनीकी बाधाओं और विभागीय ढिलाई से परेशान निवेशकों का भरोसा अब टूटने लगा है। चैलस रियल एस्टेट ने अपने 100 करोड़ रुपये वापस लेने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

कोर्ट ने पांच प्रतिशत राशि काटकर शेष 95 करोड़ रुपये लौटाने का निर्देश दिया। माना जा रहा है कि दूसरे निवेशक भी अब पीछे हट सकते हैं।

आम जनता सबसे ज्यादा प्रभावित
स्मार्ट सिटी योजना के तहत आम लोगों के लिए करीब 5000 फ्लैट, बेहतर अस्पताल, स्कूल, तकनीकी कॉलेज, माल और रोजगार के नए अवसर विकसित होने थे, लेकिन परियोजनाएं अटकने से सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ रहा है।

करोड़ों खर्च कर तैयार किया गया इंफ्रास्ट्रक्चर भी खाली पड़ा है और स्मार्ट सिटी का सपना धीरे-धीरे अव्यवस्था की भेंट चढ़ता दिख रहा है।

इन कंपनियों को मिला है प्लॉट
    चैलस रियलटर्स
    मालती रेसिडेंसी इंफ्रा प्रोजेक्ट
    अनंता रियलिटी
    मणिकरण एक्सेल
    जेएस क्लस्सी
    बिग रियलटर्स
    इक्फाई यूनिवर्सिटी
    राइट पाथ फाउंडेशन
    प्रमुख प्रस्तावित परियोजनाएं
    5000 आवासीय फ्लैट
    मेडिकल कॉलेज व अस्पताल
    टेक्निकल कॉलेज
    शापिंग माल
    फाइव स्टार होटल
    स्कूल और कमर्शियल काम्प्लेक्स

 

2