Raghav Chadha: आम आदमी पार्टी (AAP) के कद्दावर नेता राघव चड्ढा ने पार्टी को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया है। राजनीति के इस बड़े उलटफेर ने न केवल दिल्ली और पंजाब की सियासत में हलचल मचा दी है, बल्कि इसका सीधा असर चड्ढा की डिजिटल लोकप्रियता पर भी देखने को मिल रहा है।
राघव चड्ढा के सोशल मीडिया ग्राफ में गिरावट
बताते चले कि, राघव चड्ढा के इस फैसले से उनके समर्थकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण उनके इंस्टाग्राम हैंडल पर मिल रहा है। महज दो दिनों के भीतर, 1 मिलियन (10 लाख) से अधिक लोगों ने उन्हें अनफॉलो कर दिया है। 23 अप्रैल तक जहाँ उनके फॉलोअर्स की संख्या 14.6 मिलियन थी, वहीं बीजेपी जॉइन करने के बाद यह घटकर 13.5 मिलियन रह गई है। यह डिजिटल पलायन इस बात का संकेत है कि ‘आप’ समर्थक उनके इस दलबदल को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
आम आदमी पार्टी के संसदीय दल में बड़ी टूट
राघव चड्ढा के साथ ‘आप’ के 6 अन्य सांसदों ने भी इस्तीफा देकर पार्टी को बड़ा झटका दिया है। इनमें संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रम साहनी, स्वाति मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता और हरभजन सिंह शामिल हैं। हालाँकि, सभी ने अभी बीजेपी का दामन नहीं थामा है। फिलहाल राघव, संदीप और अशोक मित्तल ने आधिकारिक तौर पर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली है। स्वाति मालीवाल ने भी सोशल मीडिया के जरिए अपने इस्तीफे की पुष्टि कर दी है और सभी सांसदों ने राज्यसभा सचिवालय को औपचारिक दस्तावेज सौंप दिए हैं।
डिप्टी लीडर पद से विदाई बनी बगावत की वजह
राघव चड्ढा की इस नाराजगी के पीछे मुख्य कारण राज्यसभा में उनकी भूमिका को कम करना माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी ने उन्हें डिप्टी लीडर के पद से हटाकर अशोक मित्तल को यह जिम्मेदारी सौंप दी थी। पद छीने जाने के बाद चड्ढा ने वीडियो जारी कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी। इसके अलावा, पिछले काफी समय से वे पार्टी की आंतरिक गतिविधियों और कार्यक्रमों से नदारद थे। चर्चा यह भी है कि वे संसद में तो सक्रिय थे, लेकिन अपने स्थानीय क्षेत्र की अनदेखी कर रहे थे।
दिल्ली और पंजाब में विधायकों को बचाने की चुनौती
राघव चड्ढा का बीजेपी में जाना अरविंद केजरीवाल के लिए दोहरी मुसीबत लेकर आया है। चड्ढा न केवल खुद गए, बल्कि 6 सांसदों को भी साथ ले गए। अब कयास लगाए जा रहे हैं कि उनका अगला निशाना दिल्ली के 22 विधायक और पंजाब के ‘आप’ नेता हो सकते हैं। पंजाब चुनाव से ठीक पहले इस तरह की टूट पार्टी की नींव हिला सकती है। अब केजरीवाल के सामने खाली हुई 7 राज्यसभा सीटों को भरने और अपने विधायकों को एकजुट रखने की कठिन चुनौती है।









