Jagannath Puri Mandir: ओडिशा के तटवर्ती शहर पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर हिंदू धर्म के सबसे पवित्र चार धामों में से एक है। यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को समर्पित है। इस ऐतिहासिक मंदिर के गर्भगृह में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा की काठ (लकड़ी) की अद्भुत मूर्तियां विराजमान हैं। सदियों पुराने इस पावन धाम से कई ऐसी चमत्कारी और रहस्यमयी बातें जुड़ी हैं, जिनका जवाब आज का आधुनिक विज्ञान भी नहीं ढूंढ पाया है।
सिंहद्वार पार करते ही गायब हो जाती है समुद्र की गर्जना
बताते चले कि, पुरी जगन्नाथ मंदिर की भौगोलिक स्थिति बेहद मनमोहक है क्योंकि यह समुद्र के बिल्कुल किनारे स्थित है। मंदिर के ठीक बाहर तक समंदर की लहरों की बहुत तेज आवाज (गर्जना) सुनाई देती है। लेकिन जैसे ही कोई श्रद्धालु मंदिर के मुख्य द्वार यानी सिंहद्वार के अंदर अपना पहला कदम रखता है, वैसे ही समुद्र की लहरों की आवाज पूरी तरह शांत हो जाती है।
स्थानीय लोगों और पौराणिक ग्रंथों में एक विशेष मान्यता प्रचलित:
ऐसी मान्यता है कि एक बार देवी सुभद्रा ने मंदिर के भीतर पूर्ण एकांत और शांति का अनुरोध किया था। उनकी इसी इच्छा का सम्मान करते हुए आज भी मंदिर परिसर के अंदर समंदर की लहरों का शोर बिल्कुल सुनाई नहीं देता।
मंदिर के गुंबद के ऊपर कभी नहीं बैठते परिंदे
आमतौर पर आपने देखा होगा कि देश के किसी भी बड़े मंदिर, ऐतिहासिक इमारत या ऊंचे मकान के शिखर पर पक्षियों का बैठना और मंडराना एक बेहद स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन पुरी के इस भव्य मंदिर के ऊपर से कभी भी कोई पक्षी उड़ता हुआ दिखाई नहीं देता और न ही इसके गुंबद पर कभी कोई परिंदा बैठता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार:
- भगवान विष्णु के परम वाहन ‘पक्षियों के राजा गरुड़’ स्वयं इस पावन धाम की रक्षा करते हैं।
- उनके इस दिव्य और विहंगम डर की वजह से कोई भी अन्य पक्षी इस मंदिर के ऊपर से उड़ान भरने की हिम्मत नहीं करता।
800 साल पुरानी झंडा बदलने की अनोखी परंपरा
पुरी जगन्नाथ मंदिर के भव्य और ऊंचे शिखर पर लगा हुआ पतित पावन झंडा (ध्वज) हमेशा बहने वाली हवा की दिशा के बिल्कुल विपरीत लहराता है। विज्ञान के नियमों को चुनौती देने वाला यह करिश्मा सदियों से वैज्ञानिकों के लिए भी शोध का विषय बना हुआ है।
इस मंदिर का शिखर करीब 45 मंजिला ऊंची इमारत जितना विशाल है, जिस पर चढ़कर मंदिर का झंडा रोजाना बदला जाता है। यह बेहद कठिन और जोखिम भरी परंपरा पिछले 800 सालों से भी अधिक समय से बिना रुके अनवरत चली आ रही है। ऐसी मान्यता है कि यदि किसी भी दिन भूलवश मंदिर का यह झंडा नहीं बदला गया, तो मंदिर के कपाट अगले 18 वर्षों के लिए पूरी तरह बंद हो सकते हैं।
अष्टधातु से निर्मित 2.2 टन का नीलचक्र
जगन्नाथ मंदिर के सबसे ऊपरी शिखर पर स्थापित भव्य ‘नीलचक्र’ अपने आप में बेहद रहस्यमयी और इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना है। अष्टधातु से बने इस चक्र का कुल वजन लगभग 2.2 टन (2200 किलोग्राम) बताया जाता है। इस चक्र की सबसे बड़ी जादुई विशेषता यह है कि आप इसे पुरी शहर के किसी भी कोने या किसी भी दिशा से खड़े होकर देखेंगे, इसका मुख हमेशा आपकी ही तरफ बिल्कुल सीधा नजर आएगा। ऐसा लगता है मानो यह चक्र हर दिशा से केवल आपको ही देख रहा हो।










