Pradosh Vrat 2026: अश्विन मास का पहला प्रदोष व्रत कब? जानें दिन, तारीख और शुभ मुहूर्त

अश्विन मास के कृष्ण पक्ष का प्रदोष व्रत इस बार खास माना जा रहा है। भक्त जानें प्रदोष व्रत की सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और भगवान शिव की पूजन विधि।

Pradosh Vrat 2026

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अक्टूबर 6, 2026

Pradosh Vrat 2026: सनातन धर्म में प्रदोष व्रत भगवान शिव की आराधना के लिए सबसे महत्वपूर्ण और फलदायी व्रतों में से एक माना जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में सूर्यास्त के आसपास के समय यानी प्रदोष काल को महादेव की पूजा के लिए अत्यंत विशेष माना गया है। ऐसा विश्वास है कि इस पावन काल में सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करने से जीवन में सुख, शांति, समृद्धि का वास होता है और तमाम तरह के कष्टों व बाधाओं से मुक्ति मिलती है। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाले इस प्रदोष व्रत को लेकर श्रद्धालुओं में खासा उत्साह रहता है। आइए जानते हैं कि इस बार प्रदोष व्रत की सही तिथि क्या है, पूजा का शुभ मुहूर्त कब रहेगा और इसकी संपूर्ण पूजन विधि क्या है।

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कब है अक्तूबर का पहला प्रदोष व्रत?

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अश्विन मास का पहला प्रदोष व्रत कब?

पंचांग गणना के अनुसार, अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 अक्तूबर की रात 11:16 बजे आरंभ होगी और इसका समापन अगले दिन यानी 8 अक्तूबर को रात 10:15 बजे होगा। चूंकि प्रदोष काल की मुख्यव्याप्ति 8 अक्तूबर को प्राप्त हो रही है, इसलिए उदया तिथि और प्रदोष व्यापिनी तिथि के आधार पर यह व्रत गुरुवार, 8 अक्तूबर 2026 को रखा जाएगा। इस दिन भगवान शिव के साथ-साथ देव गुरु बृहस्पति की आराधना का भी संयोग बनता है।

प्रदोष पूजा का शुभ मुहूर्त

8 अक्तूबर 2026 को भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा के लिए प्रदोष काल शाम 05:59 बजे से रात 08:27 बजे तक रहेगा। लगभग ढाई घंटे की यह समयावधि महादेव की उपासना के लिए सर्वोत्कृष्ट मानी गई है। भक्तगण इस निश्चित अवधि के भीतर शिव मंदिर या अपने घर के पूजा स्थल पर शिवजी का जलाभिषेक, पूजन और आरती संपन्न कर सकते हैं।

प्रदोष व्रत की पूजन विधि

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अश्विन मास का पहला प्रदोष व्रत कब?

प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। पूजन प्रक्रिया के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं। सबसे पहले घर या मंदिर के शिवलिंग का गंगाजल और शुद्ध जल से अभिषेक करें। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से महादेव का अभिषेक करें।

अभिषेक के उपरांत भगवान शिव को 11 या 21 ताजे बेलपत्र अर्पित करें। इसके साथ ही धतूरा, आक के फूल, ऋतुफल, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, दीप, श्वेत चंदन और अक्षत (चावल) जैसी पवित्र सामग्री चढ़ाएं। महादेव को शक्कर और शुद्ध घी से बनी मिठाई का भोग लगाएं। प्रदोष व्रत में सायं कालीन पूजा का विशेष महत्व होता है। प्रदोष काल शुरू होने से ठीक पहले एक बार पुनः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद शिव चालीसा का पाठ करें, शिव मंत्रों का जाप करें और प्रदोष व्रत की कथा का श्रवण या पठन करें। अंत में घी का दीपक और कपूर जलाकर श्रद्धापूर्वक भगवान शिव की आरती करें।

प्रदोष काल में शिव पूजा का धार्मिक महत्व

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अश्विन मास का पहला प्रदोष व्रत कब?

शास्त्रों के अनुसार, सूर्यास्त से ठीक पहले और रात्रि के आगमन से पूर्व के काल को प्रदोष काल कहा जाता है। मान्यता है कि इस विशेष पहर में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं और ब्रह्मांड की समस्त नकारात्मक ऊर्जा का नाश करते हैं। इसलिए इस काल में की गई शिव उपासना का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार पूजन सामग्री अर्पित कर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं।

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Disclaimer: यहां दी गई जानकारियां पौराणिक कथाओं,धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। खबर में दी जानकारी पर विश्वास व्यक्ति की अपनी सूझ-बूझ और विवेक पर निर्भर करता है। प्राइम टीवी इंडिया इस पर दावा नहीं करता है ना ही किसी बात पर सत्यता का प्रमाण देता है।