Rabindranath Tagore Jayanti 2026: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती (पोइला बोइशाख) के पावन अवसर पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री मोदी ने टैगोर के योगदान को याद करते हुए उन्हें भारत की सभ्यतागत चेतना की एक ऐसी कालजयी आवाज बताया, जिसने न केवल देश बल्कि पूरी दुनिया को मानवता का पाठ पढ़ाया। पश्चिम बंगाल में इस विशेष दिन को ‘पोची हे बोइशाख’ के रूप में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि गुरुदेव का साहित्य, शिक्षा, कला और दर्शन के क्षेत्र में दिया गया असाधारण योगदान आज भी नई पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।
सोशल मीडिया पर पीएम मोदी का संदेश
बताते चले कि, प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के माध्यम से गुरुदेव को नमन किया। उन्होंने अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया कि रवींद्रनाथ टैगोर केवल एक महान कवि ही नहीं थे, बल्कि वे एक विलक्षण चिंतक, लेखक, दार्शनिक, शिक्षाविद और उच्च कोटि के कलाकार भी थे। पीएम मोदी ने लिखा कि आज के इस विशेष दिन पर हम उस महान आत्मा को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं, जिन्होंने भारतीय संस्कृति की सुगंध को वैश्विक स्तर पर फैलाया। टैगोर के विचार आज भी समाज को एक नई दिशा दिखाने का सामर्थ्य रखते हैं।
सांस्कृतिक आत्मविश्वास और वैश्विक मानवतावाद के प्रणेता
अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा कि गुरुदेव ने अपनी रचनाओं के माध्यम से मानवता की गहरी संवेदनाओं और भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ आदर्शों को जीवंत किया है। प्रधानमंत्री के अनुसार, टैगोर ने भारतीय समाज को नए विचार, रचनात्मक ऊर्जा और सबसे महत्वपूर्ण ‘सांस्कृतिक आत्मविश्वास’ प्रदान किया। उन्होंने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि गुरुदेव की विचारधारा आने वाले समय में भी लोगों के मन को आलोकित करती रहेगी और हमारे राष्ट्र निर्माण के प्रयासों का मार्गदर्शन करती रहेगी। टैगोर का जीवन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना का साक्षात प्रमाण था।
एशिया के प्रथम नोबेल विजेता और महान शिक्षाविद
रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 (बंगाली कैलेंडर के अनुसार 25 बोइशाख 1268) को हुआ था। वे केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया के पहले व्यक्ति थे जिन्हें 1913 में साहित्य के क्षेत्र में उनकी कालजयी काव्य कृति ‘गीतांजलि’ के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। टैगोर की महानता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने दो देशों के राष्ट्रगान की रचना की—भारत का ‘जन गण मन’ और बांग्लादेश का ‘आमार सोनार बांग्ला’। वे भारतीय पुनर्जागरण के एक ऐसे स्तंभ थे, जिन्होंने शांति निकेतन में ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय’ जैसी संस्था की नींव रखी, जो आज भी कला और शिक्षा का वैश्विक केंद्र है।
देशभर में सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन
गुरुदेव की जयंती के उपलक्ष्य में पश्चिम बंगाल सहित समूचे देश में विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का तांता लगा रहा। कोलकाता और शांतिनिकेतन में विशेष उत्सव आयोजित किए गए, जहाँ कविता पाठ, रबींद्र संगीत और नृत्य प्रस्तुतियों के जरिए उनकी विरासत को याद किया गया। उनकी रचनाओं में राष्ट्रवाद, प्रकृति के प्रति प्रेम और आध्यात्मिकता का जो संगम मिलता है, वह आज भी हर भारतीय के हृदय में रचा-बसा है। देशभर के बुद्धिजीवियों और कलाकारों ने इस अवसर पर टैगोर के दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प दोहराया।










