मध्य प्रदेश में सरकारी बंगला खाली नहीं कर रहे अधिकारी और नेता, नोटिस से दी बेदखली की चेतावनी

 भोपाल मध्यप्रदेश में सत्ता तो बदल गई, लेकिन सरकारी बंगलों पर जमे रसूखदार अब तक अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे. अब मोहन सरकार ने साफ संदेश दे दिया है कि पद गया, तो बंगला भी छोड़ना पड़ेगा. नियम सबके लिए बराबर हैं, चाहे वह अपनी ही पार्टी का कितना बड़ा नेता क्यों न हो. पात्रता समाप्त होने के बावजूद सरकारी आवासों पर कब्जा जमाए पूर्व मंत्रियों, पूर्व सांसदों और आईएएस अफसरों के खिलाफ सरकार ने सख़्त रुख अपनाते हुए बंगला खाली करने के नोटिस भेजे हैं. संपदा संचालनालय ने ऐसे सभी नामों पर नोटिस जारी कर दिए हैं,

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Published On :

जनवरी 11, 2026

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 भोपाल

मध्यप्रदेश में सत्ता तो बदल गई, लेकिन सरकारी बंगलों पर जमे रसूखदार अब तक अपनी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं थे. अब मोहन सरकार ने साफ संदेश दे दिया है कि पद गया, तो बंगला भी छोड़ना पड़ेगा. नियम सबके लिए बराबर हैं, चाहे वह अपनी ही पार्टी का कितना बड़ा नेता क्यों न हो.

पात्रता समाप्त होने के बावजूद सरकारी आवासों पर कब्जा जमाए पूर्व मंत्रियों, पूर्व सांसदों और आईएएस अफसरों के खिलाफ सरकार ने सख़्त रुख अपनाते हुए बंगला खाली करने के नोटिस भेजे हैं. संपदा संचालनालय ने ऐसे सभी नामों पर नोटिस जारी कर दिए हैं, जो सालों से नियमों को ताक पर रखकर सरकारी बंगलों का सुख भोग रहे थे.

बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष स्वर्गीय प्रभात झा के परिवार को भोपाल के 74 बंगले क्षेत्र में स्थित बी-टाइप आवास खाली करने के लिए 13 जनवरी तक का नोटिस दिया गया है. नोटिस में दो टूक चेतावनी भी दी गयी है कि समय पर बंगला खाली नहीं हुआ, तो प्रशासन बल प्रयोग कर बेदखली करेगा.

 सुधीर कुमार कोचर को दो साल पहले सरकार ने दमोह का कलेक्टर बनाया था। इसके लिए पहले वह मंत्रालय में पदस्थ थे। तब उन्हें भोपाल में शासकीय आवास आवंटित किया गया था, लेकिन अब तक उसे उन्होंने खाली नहीं किया है। जबकि, नियमानुसार अधिकतम छह माह वह इसे रख सकते थे।

कोचर इस तरह नियम विरुद्ध तरीके से आवास रखने वाले एक मात्र अधिकारी नहीं हैं। उन जैसे कई अधिकारी हैं। यही स्थिति नेताओं की भी है, जिसमें दिवंगत भाजपा नेता प्रभात झा और पूर्व मंत्री रामपाल सिंह भी हैं। झा के स्वजन को नोटिस देकर सात दिनों में आवास खाली करने के लिए कहा गया है।

संपदा संचालनालय के अधिकारियों का कहना है कि भोपाल में सरकारी आवासों की कमी बनी रहती है। इसका बड़ा कारण यह है कि जिन लोगों को एक बार आवास आवंटित हो जाते हैं, वे आसानी से खाली नहीं करते हैं। नियमानुसार अधिकारी का जब यहां से तबादला हो जाता है तो उसे आवास खाली कर देना चाहिए। इसके लिए अधिकतम छह माह का समय दिया जाता है। आमतौर पर इस अवधि में कम ही आवास रिक्त होते हैं, जबकि दूसरे अधिकारी स्थानांतरित होकर आ जाते हैं। इनके लिए आवास की व्यवस्था करने में परेशानी होती है।

भोपाल के बाहर पदस्थ हैं, पर बंगला नहीं किया खाली

जैसे दमोह कलेक्टर बनाकर सुधीर कुमार कोचर को भेजा गया पर उन्होंने अब तक आवास रिक्त नहीं किया। रत्नाकर झा भी भोपाल के बाहर पदस्थ हैं लेकिन आवास पर कब्जा बना हुआ है। महीप तेजस्वी राजगढ़ कलेक्टर हैं तो सुधीर कुमार शाही सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अधिकारियों की तरह नेता भी हैं जो एक बार आवास आवंटित होने के बाद रिक्त नहीं करते हैं। भाजपा नेता प्रभात झा को 74 बंगले में आवास आवंटित हुआ था। उनके निधन के बाद अब भी कब्जा स्वजन के पास है। इसी तरह पूर्व मंत्री रामपाल सिंह विधानसभा चुनाव हार गए लेकिन शिवाजी नगर में आवास रखे हुए हैं।

संगठन के कई नेता विधायकों के नाम पर बी और सी श्रेणी के आवास आवंटित कराकर रह रहे हैं। संपदा के सूत्रों का कहना है कि इनमें से कुछ नेताओं को नोटिस देकर आवास खाली करने के लिए कहा गया है। साथ ही यह चेतावनी भी दी है कि यदि आवास खाली नहीं किए जाते हैं तो फिर बल प्रयोग किया जाएगा।

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