OBC Reservation: क्रीमी लेयर पर केंद्र की चिंता, कहा- ज्यादा आय वालों को भी मिल सकता है लाभ

ओबीसी क्रीमीलेयर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार ने राहत पाने के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया है, जिस पर अब सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

OBC Reservation

Wrriten By :

Nivedita Kasaudhan

Published On :

अगस्त 25, 2026

OBC Reservation: ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने को लेकर विवाद एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने अदालत में आवेदन दाखिल कर 11 मार्च 2026 को दिए गए फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा है। केंद्र ने विशेष रूप से अपील की है कि इस फैसले को संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 पर तत्काल लागू करने से छूट दी जाए। सरकार का तर्क है कि फैसले को तुरंत लागू करने से पहले से चल रही भर्ती और प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर गंभीर असर पड़ सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा था?

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने ‘भारत सरकार बनाम रोहित नाथन’ मामले में क्रीमी लेयर से जुड़े महत्वपूर्ण निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि किसी उम्मीदवार को केवल उसके माता-पिता की आय या वेतन के आधार पर ओबीसी क्रीमी लेयर में शामिल नहीं किया जा सकता।

क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय माता-पिता के पद, सामाजिक स्थिति और अन्य संबंधित परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अदालत ने सरकार के 2004 के उस आदेश पर भी सवाल उठाया था, जिसमें PSU, बैंक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के लिए वेतन आधारित आय के आधार पर क्रीमी लेयर का निर्धारण किया जाता था।

वहीं, सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए पद को आधार बनाया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए समानता के अधिकार के संदर्भ में उचित नहीं माना था।

केंद्र को किन परेशानियों की आशंका?

केंद्र सरकार ने अपने आवेदन में कहा है कि फैसले को तत्काल लागू करने से प्रशासनिक स्तर पर कई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। सिविल सेवा परीक्षा 2025 का अंतिम परिणाम 6 मार्च को जारी हो चुका है। ऐसे में फैसले को इस स्तर पर लागू करने से कैडर और सेवाओं के आवंटन, प्रशिक्षण तथा नियुक्ति से जुड़ी प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं। सरकार ने यह भी आशंका जताई है कि पुराने मामलों पर फैसले का प्रभाव पड़ने से बड़ी संख्या में कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं।

3.70 लाख नियुक्तियों पर पड़ सकता है असर

केंद्र के मुताबिक, 2016 के बाद केंद्र सरकार, रेलवे, बैंक, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों समेत विभिन्न संस्थानों में लगभग 3.70 लाख ओबीसी नियुक्तियां हुई हैं। सरकार का कहना है कि यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो इन नियुक्तियों से जुड़े कई नए विवाद और मुकदमे सामने आ सकते हैं।

नियम बदलने में लग सकता है लंबा समय

केंद्र ने अदालत को बताया है कि सरकारी नौकरियों में पद और सामाजिक स्थिति को आधार बनाकर नई व्यवस्था लागू करना आसान प्रक्रिया नहीं है। इसके लिए राज्यों से बातचीत के अलावा बड़ी संख्या में सरकारी संस्थानों और पदों का अध्ययन करना होगा। सरकार के अनुसार इस प्रक्रिया में करीब दो साल तक का समय लग सकता है। केंद्र ने यह भी कहा कि निजी क्षेत्र के पदों को सरकारी पदों के बराबर मानने के लिए अलग से व्यापक प्रक्रिया की जरूरत होगी।

ज्यादा आय वाले परिवारों को लाभ मिलने की चिंता

केंद्र सरकार ने अपनी दलील में यह चिंता भी जाहिर की है कि केवल पद को आधार बनाने से अधिक आय वाले परिवारों के बच्चों को भी नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ मिल सकता है। उदाहरण के तौर पर सरकार ने कहा कि सालाना एक करोड़ रुपये से अधिक कमाने वाले माता-पिता के बच्चे भी कुछ परिस्थितियों में ओबीसी आरक्षण के दायरे में आ सकते हैं।

सरकार का तर्क है कि ऐसी स्थिति आर्थिक रूप से कमजोर और सीमित संसाधनों वाले ओबीसी उम्मीदवारों के हितों को प्रभावित कर सकती है।

जल्द सुनवाई के लिए विशेष बेंच की संभावना

केंद्र ने चीफ जस्टिस से अनुरोध किया है कि उसके आवेदन को उसी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए भेजा जाए, जिसने मार्च में फैसला सुनाया था। चीफ जस्टिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जल्द सुनवाई के लिए विशेष बेंच गठित करने पर सहमति जताई है। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं।

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