दिल्ली में प्रदूषण से लड़ने की नई तैयारी, एल्गी टेक्नोलॉजी से हवा साफ करने की योजना

नई दिल्ली  जोहड़ों और झीलों में पाई जाने वाली काई यानी सूक्ष्म शैवाल से भी प्रदूषित हवा साफ करने में मदद मिल सकती है। इसी तरह की तकनीकों के इस्तेमाल से दिल्ली में प्रदूषण कम करने की तैयारी है। DPCC की योजना के तहत राजधानी में 40 जगहों पर अलग-अलग तकनीकें लगाई जाएंगी। इस परियोजना पर 104 करोड़ रुपये खर्च होंगे। कंपनियों को प्रदूषण में तय लक्ष्य के मुताबिक कमी लाने पर ही भुगतान किया जाएगा। अधिकारी के अनुसार, इस परियोजना में स्टार्टअप और अन्य कंपनियों को मौका दिया जा रहा है। परियोजना पर 104 करोड़ खर्च होंगे। लिक्विड ट्री

Wrriten By :

Editor

Published On :

अक्टूबर 22, 2026

Advertisements
728x90-Kanya-Sumangla-Mission-Shakti-Digital

नई दिल्ली
 जोहड़ों और झीलों में पाई जाने वाली काई यानी सूक्ष्म शैवाल से भी प्रदूषित हवा साफ करने में मदद मिल सकती है। इसी तरह की तकनीकों के इस्तेमाल से दिल्ली में प्रदूषण कम करने की तैयारी है।

DPCC की योजना के तहत राजधानी में 40 जगहों पर अलग-अलग तकनीकें लगाई जाएंगी। इस परियोजना पर 104 करोड़ रुपये खर्च होंगे। कंपनियों को प्रदूषण में तय लक्ष्य के मुताबिक कमी लाने पर ही भुगतान किया जाएगा। अधिकारी के अनुसार, इस परियोजना में स्टार्टअप और अन्य कंपनियों को मौका दिया जा रहा है।

परियोजना पर 104 करोड़ खर्च होंगे।
लिक्विड ट्री तकनीक में खास तरह की एल्गी को पानी के साथ पारदर्शी चैंबर में रखा जाता है। नीचे से प्रदूषित हवा छोड़ी जाती है। हवा के इस पानी से गुजरने पर एल्गी प्रकाश संश्लेषण के जरिए कार्बन डाइऑक्साइड सोखती है और ऑक्सीजन छोड़ती है।

40 जगहों पर होगा तकनीक का यूज
योजना के तहत कनॉट प्लेस, खान मार्केट, चांदनी चौक, डिफेंस कॉलोनी, प्रमुख बस अड्डों, अस्पतालों और दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस जैसे स्थानों पर मशीनें लगाई जा सकती है। परियोजना को 40 पैकेज में बांटा गया है। हर पैकेज की अनुमानित लागत 2.6 करोड़ रुपये है। कंपनियों को उपकरण लगाने के साथ उनका संचालन और रखरखाव भी करना होगा। शुरुआती अनुबंध एक साल का होगा।

प्रदूषण में कमी के लक्ष्य पर मिलेगा भुगतान
इस परियोजना में कंपनियों को केवल मशीनें लगाने तक सीमित नहीं रहना होगा, बल्कि उनके प्रदर्शन की भी निगरानी की जाएगी। प्रदूषण में तय लक्ष्य के मुताबिक कमी आने पर ही भुगतान किया जाएगा। इससे तकनीक की प्रभावशीलता और उसके वास्तविक नतीजों पर जोर रहेगा। हालांकि, राजधानी की हवा की गुणवत्ता पर इन मशीनों का कितना असर पड़ेगा, यह इनके संचालन और प्रदूषण में दर्ज होने वाली वास्तविक कमी से स्पष्ट होगा।