Nepal Election 2026: नेपाल चुनाव में ‘बालेन शाह’ फैक्टर से उड़े भारत-चीन के होश, क्या बदलेगी काठमांडू की विदेश नीति?

नेपाल के आगामी 5 मार्च के चुनाव में पूर्व मेयर बालेन शाह ने खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है। झापा-5 सीट पर केपी शर्मा ओली को चुनौती दे रहे बालेन की 'स्वतंत्र' राजनीति और राष्ट्रवादी तेवरों ने भारत और चीन दोनों को सतर्क कर दिया है। क्या काठमांडू की सत्ता अब नए हाथों में जाने वाली है?

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

फ़रवरी 20, 2026

Nepal Election 2026:  नेपाल में 5 मार्च को होने वाले आम चुनावों ने हिमालयी राष्ट्र की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि नेपाल की भविष्य की विदेश नीति और वैश्विक कूटनीति में उसकी भूमिका तय करने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।नेपाल के आगामी 2026 के चुनावों में एक ऐसा चेहरा उभर रहा है जिसने पारंपरिक दलों की नींद उड़ा दी है—बालेन शाह। मेयर से राष्ट्रीय नेता बनने की राह पर अग्रसर बालेन ने भारत और चीन के प्रभाव से हटकर एक ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का बिगुल फूंका है। क्या बालेन का उदय हिमालयी राष्ट्र में भारत के प्रभाव को कम करेगा या चीन के बीआरआई (BRI) प्रोजेक्ट्स को रोकेगा? नेपाल की बदलती सियासत का पूरा सच यहाँ पढ़ें।

चुनावी रणभेरी और प्रमुख दलों का घोषणापत्र

नेपाल की तीनों मुख्य राजनीतिक शक्तियों—नेपाली कांग्रेस, सीपीएन-यूएमएल और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP)—ने अपने चुनावी संकल्प पत्र सार्वजनिक कर दिए हैं। इन घोषणापत्रों में एक बात समान है: नेपाल अब किसी भी गुटबाजी का हिस्सा बनने के बजाय अपने पड़ोसी देशों, विशेषकर भारत और चीन के साथ मैत्रीपूर्ण और संतुलित संबंधों को प्राथमिकता देना चाहता है। इन दलों ने स्पष्ट किया है कि नेपाल की प्रगति का रास्ता क्षेत्रीय संपर्क (Connectivity) और मजबूत आर्थिक साझेदारी से होकर गुजरता है।

बालेन शाह का ‘सक्रिय सेतु’ मॉडल: बफर स्टेट की छवि का अंत

इस चुनाव में सबसे बड़ा आकर्षण राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) है, जिसने काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है। आरएसपी ने अपनी विदेश नीति में “बफर स्टेट” की पारंपरिक सोच को त्यागकर नेपाल को एक “सक्रिय सेतु” (Active Bridge) बनाने का वादा किया है। पार्टी का लक्ष्य भारत और चीन के बीच एक गतिशील आर्थिक गलियारा बनना है, जिससे त्रिपक्षीय व्यापारिक लाभ प्राप्त किया जा सके। बालेन शाह की टीम नेपाल को दक्षिण एशिया के एक आधुनिक हब के रूप में देख रही है।

भारतीय डिजिटल मॉडल और चीनी इंफ्रास्ट्रक्चर का मेल

आरएसपी की रणनीति बेहद व्यावहारिक नजर आती है। पार्टी का प्रस्ताव है कि नेपाल को भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) और अर्थव्यवस्था के औपचारिककरण के सफल मॉडल को अपनाना चाहिए। वहीं, बुनियादी ढांचे के विकास के लिए चीन के रियायती वित्तपोषण (Concessional Financing) और विश्वस्तरीय निर्माण तकनीक का लाभ उठाना चाहिए। यह “दोनों हाथों में लड्डू” वाली नीति नेपाल के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो रही है, जो विकास के लिए पड़ोसियों के साथ समान दूरी और समान लाभ चाहते हैं।

नेपाली कांग्रेस की तटस्थता: सैन्य प्रतिस्पर्धा से दूरी

देश की सबसे पुरानी पार्टी, नेपाली कांग्रेस ने अपनी विदेश नीति में ‘गुटनिरपेक्षता’ पर जोर दिया है। पार्टी ने संकल्प लिया है कि नेपाल किसी भी प्रकार के वैश्विक रक्षा गठबंधन या सैन्य संघर्ष का हिस्सा नहीं बनेगा। महाशक्तियों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच, नेपाली कांग्रेस का रुख स्पष्ट है—वह सभी देशों के साथ समानता के आधार पर संबंध रखेगी। पार्टी का मानना है कि नेपाल की भूमि का उपयोग किसी भी पड़ोसी देश के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा और राष्ट्रीय हित ही सर्वोच्च रहेंगे।

सीपीएन-यूएमएल की नीति: “सबके साथ मित्रता, किसी से शत्रुता नहीं”

पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल ने अपनी पुरानी और परीक्षित नीति को फिर से दोहराया है। उनका मुख्य नारा “सबसे मित्रता और किसी से शत्रुता नहीं” है। यूएमएल का तर्क है कि नेपाल को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ अपने जुड़ाव को व्यापक बनाना चाहिए ताकि निवेश के नए रास्ते खुल सकें। पार्टी ने आश्वासन दिया है कि वह ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएगी जिससे भारत या चीन के सुरक्षा हितों को ठेस पहुंचे। उनके लिए क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा है।

नेपाल के लिए एक नया कूटनीतिक सवेरा

5 मार्च के चुनाव परिणाम यह तय करेंगे कि नेपाल एक निष्क्रिय पड़ोसी बना रहेगा या एशिया की दो महाशक्तियों के बीच एक मजबूत आर्थिक कड़ी के रूप में उभरेगा। बालेन शाह जैसे नए चेहरों के आने से कूटनीति में जो नया उत्साह दिखा है, उसने पारंपरिक राजनीति को कड़ी चुनौती दी है। अब गेंद नेपाल की जनता के पाले में है कि वे किस ‘विज़न’ को चुनते हैं।

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