NEET UG Paper Leak: बायोमेट्रिक, जीपीएस और एआई… सब फेल! आखिर कौन था सिस्टम के अंदर बैठा ‘विभीषण’?

NEET UG Paper Leak मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब परीक्षा सुरक्षा के लिए बायोमेट्रिक, GPS और AI जैसी तकनीक मौजूद थी, तो सेंध कैसे लगी। आखिर सिस्टम के अंदर कौन सी कड़ी कमजोर साबित हुई और किसकी लापरवाही से लाखों छात्रों का भरोसा टूटा, जानिए पूरी कहानी।

कौन था सिस्टम के अंदर बैठा 'विभीषण'?

Wrriten By :

Neha Mishra

Published On :

जुलाई 23, 2026

NEET UG Paper Leak: NEET UG परीक्षा में पेपर लीक विवाद ने एक बार फिर देश की सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी इस परीक्षा में गड़बड़ी सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पेपर लीक रोकने के लिए विशेषज्ञों ने पहले ही समाधान सुझा दिए थे, तो उन्हें पूरी तरह लागू क्यों नहीं किया गया।

3 मई 2026 को आयोजित NEET UG परीक्षा में करीब 22.7 लाख अभ्यर्थी शामिल हुए थे। परीक्षा से पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म व्हाट्सएप और टेलीग्राम पर एक कथित गेस पेपर वायरल हुआ, जिसके कई सवाल असली प्रश्नपत्र से मेल खाने का दावा किया गया। इसके बाद 12 मई को नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने परीक्षा रद्द कर दी और 21 जून 2026 को दोबारा परीक्षा आयोजित की गई।

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2024 में ही तैयार हो चुका था सुधारों का खाका

NEET 2024 विवाद के बाद शिक्षा मंत्रालय ने पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था। इस समिति ने कई बैठकों के बाद 21 अक्टूबर 2024 को सरकार को 184 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट में परीक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को पहचानने के साथ-साथ उन्हें दूर करने के लिए 101 महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे। समिति ने हजारों छात्रों, अभिभावकों, विशेषज्ञों, IIT, AIIMS, राज्यों और जांच एजेंसियों से मिले सुझावों के आधार पर अपनी सिफारिशें तैयार की थीं। रिपोर्ट में सुधारों को मिशन मोड में लागू करने की जरूरत बताई गई थी, लेकिन अब सवाल उठ रहा है कि इतने महत्वपूर्ण सुझाव समय पर जमीन पर क्यों नहीं उतर पाए।

पेपर लीक रोकने के लिए सुझाया गया नया मॉडल

विशेषज्ञ समिति ने पेपर लीक की सबसे बड़ी वजह प्रश्नपत्र की छपाई, भंडारण और परिवहन प्रक्रिया को बताया था। समिति के अनुसार, प्रश्नपत्र जितने अधिक लोगों और स्थानों से होकर गुजरता है, लीक की संभावना उतनी ही बढ़ जाती है। इसके समाधान के तौर पर “कंप्यूटर असिस्टेड सिक्योर पेपर बेस्ड टेस्टिंग” मॉडल का सुझाव दिया गया था। इस व्यवस्था में प्रश्नपत्र पहले से देशभर में नहीं भेजे जाते, बल्कि एन्क्रिप्टेड फॉर्म में परीक्षा केंद्र के सुरक्षित सर्वर तक पहुंचाए जाते और परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले केंद्र पर ही प्रिंट किए जाते। समिति ने इस व्यवस्था को लागू करने से पहले पायलट प्रोजेक्ट चलाने की सलाह भी दी थी। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब समाधान सामने था तो उसका परीक्षण समय पर क्यों नहीं किया गया।

समिति की प्रमुख सिफारिशें जो चर्चा में रहीं

विशेषज्ञ समिति ने परीक्षा सुरक्षा मजबूत करने के लिए कई अहम सुझाव दिए थे। इनमें प्रश्नपत्र की सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था, प्रिंटिंग सेंटर पर सख्त निगरानी, कर्मचारियों की जांच, हर प्रश्नपत्र की ट्रैकिंग, परिवहन में GPS निगरानी और परीक्षा केंद्रों की कड़ी जांच शामिल थी। इसके अलावा समिति ने सुझाव दिया था कि परीक्षा केंद्रों का चयन कंप्यूटर आधारित प्रणाली से हो, संदिग्ध केंद्रों को हटाया जाए, बड़ी परीक्षाओं को कई चरणों में कराया जाए और अलग-अलग प्रश्नपत्र सेट तैयार किए जाएं। समिति ने यह भी कहा था कि परीक्षा प्रक्रिया की निगरानी के लिए एक स्थायी कमेटी बनाई जाए, जो समय-समय पर शिक्षा मंत्रालय को रिपोर्ट दे।

जांच में सामने आया पेपर लीक का नेटवर्क

जांच एजेंसियों के अनुसार पेपर लीक का मामला परीक्षा केंद्रों से नहीं बल्कि प्रश्नपत्र की छपाई प्रक्रिया से जुड़ा हुआ सामने आया। जांच में कई राज्यों तक फैले नेटवर्क की बात सामने आई। यह स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि विशेषज्ञ समिति ने पहले ही प्रिंटिंग और ट्रांसपोर्टेशन को सबसे संवेदनशील चरण बताया था।

सरकार के दावे और छात्रों के सवाल

सरकार का कहना है कि विशेषज्ञ समिति की कई सिफारिशों को लागू किया जा चुका है और बाकी सुधारों पर काम जारी है। राज्य और जिला स्तर पर निगरानी समितियां भी बनाई गई हैं। हालांकि, अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि 101 सिफारिशों में से कितनी पूरी तरह लागू हुईं और कितनी लंबित हैं। सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा मॉडल का पायलट परीक्षण नहीं होने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

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जवाबदेही और भरोसे की चुनौती

NEET जैसी परीक्षाएं लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़ी होती हैं। इसलिए केवल पेपर लीक की जांच करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी तय करना जरूरी है कि मौजूद सुरक्षा योजनाओं को समय पर लागू क्यों नहीं किया गया। छात्रों और अभिभावकों की सबसे बड़ी मांग यही है कि परीक्षा प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित, पारदर्शी और भरोसेमंद बने, ताकि मेहनत करने वाले उम्मीदवारों के साथ न्याय हो सके।