Haryana: हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन पर तीखा प्रहार करते हुए महिलाओं के प्रति उनकी नीतियों को ‘छलावा’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस ने वर्षों तक सत्ता में रहने के बावजूद महिलाओं को उनका वाजिब हक नहीं दिया और अब उनका असली चेहरा जनता के सामने आ चुका है।
सीएम सैनी का कांग्रेस पर हमला
मुख्यमंत्री सैनी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने वर्षों से महिला आरक्षण के नाम पर सिर्फ राजनीतिक नाटक किया है। उनके अनुसार, महिला सशक्तीकरण में बाधा डालने वाली कांग्रेस अब बेनकाब हो गई है। सैनी ने आरोप लगाया कि जब संसद में ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ पेश किया गया, तो विपक्ष ने इसे रोकने की कोशिश कर लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन किया। उन्होंने दावा किया कि इंडी गठबंधन इस बिल में अड़ंगा लगाकर खुश हो रहा है, लेकिन देश की महिलाएं समय आने पर इस अपमान का हिसाब चुकता करेंगी।
जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया
सीएम सैनी ने विपक्षी दलों पर परिसीमन और सीमा निर्धारण के मुद्दे पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष जानबूझकर इस प्रक्रिया को लेकर डर और भ्रम का माहौल पैदा कर रहा है। मुख्यमंत्री के मुताबिक, कांग्रेस अब अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है और उसकी नकारात्मक राजनीति का असली रंग अब जनता की समझ में आने लगा है। उन्होंने विश्वास जताया कि 2029 के चुनावों में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो जाएगा।
सैनी ने संसदीय क्षेत्रों के पुनर्गठन की वकालत कीौोमौैो
बढ़ती जनसंख्या और प्रशासनिक चुनौतियों का जिक्र करते हुए सैनी ने संसदीय क्षेत्रों के पुनर्गठन की वकालत की। उन्होंने बताया कि देश की 142 लोकसभा सीटों पर जनसंख्या 20 लाख से अधिक हो चुकी है, जिससे एक सांसद के लिए सभी की समस्याएं सुनना असंभव होता जा रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि भविष्य में परिसीमन के माध्यम से लोकसभा सीटों की संख्या बढ़कर 850 होनी चाहिए ताकि प्रतिनिधित्व बेहतर हो सके।
55 वर्षों का शासन बनाम महिला सशक्तिकरण के वास्तविक प्रयास
कांग्रेस के लंबे शासनकाल पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्षी दलों की महिला विरोधी कार्यशैली का इतिहास रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 55 वर्षों में कांग्रेस ने महिलाओं के उत्थान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। सैनी ने चेतावनी दी कि महिलाओं के अधिकारों को रोकने के कारण भविष्य में कांग्रेस और उसके सहयोगियों को भारी राजनीतिक परिणाम भुगतने होंगे और आगामी चुनावों में उनका अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा।









