Monsoon 2026 : देश में लेट हुई मानसून की एंट्री, कम बारिश और भीषण गर्मी से बढ़ेगी आम जनता की मुश्किलें

देश में इस साल मानसून की एंट्री बेहद लेट होने वाली है, जिससे आम जनता पर दोहरी मार पड़ेगी। मौसम विभाग (IMD) की ताजा और चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, इस बार न सिर्फ सामान्य से कम बारिश होगी बल्कि जून के महीने में भीषण गर्मी और जानलेवा लू का ऐसा टॉर्चर देखने को मिलेगा जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। जानिए वो कौन से राज्य हैं जहां पानी की भयंकर किल्लत और सूखे का सबसे ज्यादा संकट मंडरा रहा है।

Monsoon 2026

Wrriten By :

Chandan Das

Published On :

मई 29, 2026

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Monsoon 2026 :  भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार, इस साल देश में मानसून का आगमन समय से काफी देर से हो रहा है। श्रीलंका के ऊपरी हिस्से में बनी कम दबाव वाली तूफानी हवाओं और मौसमी चक्रवात के कारण मानसूनी हवाएं केरल के तट से महज 30 से 35 किलोमीटर दूर पिछले 5 दिनों से थमी हुई हैं। मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगले 2 से 3 दिनों तक मानसून के आगे बढ़ने के लिए परिस्थितियां अनुकूल नहीं हैं। आमतौर पर केरल के तट पर मानसून के पहुंचने की सामान्य तिथि 1 जून मानी जाती है, और पहले मौसम विभाग ने इसके 26 मई तक आने का अनुमान जताया था। हालांकि, बदले हुए हालातों के चलते अब इसमें लगभग 7 से 10 दिनों की देरी होने की पूरी आशंका बनी हुई है।

जून-जुलाई में भी सताएगी भीषण हीटवेव, सामान्य से अधिक रहेगा तापमान

मौसम विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल गर्मी से राहत मिलने की उम्मीद बेहद कम है। जून और जुलाई के महीनों में भी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गुजरात और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भीषण लू (हीटवेव) चलने की प्रबल संभावना व्यक्त की गई है। सामान्य तौर पर इन महीनों के दौरान देश के इन हिस्सों में औसत तापमान 30 से 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास दर्ज किया जाता है। लेकिन इस वर्ष विपरीत मौसमी परिस्थितियों के कारण औसत तापमान सामान्य के मुकाबले 3 डिग्री सेल्सियस तक अधिक रहने का अनुमान है, जिससे लोगों को झुलसाने वाली गर्मी का सामना करना पड़ेगा।

देशभर में सामान्य से 10 फीसदी कम बारिश होने का नया अनुमान

आईएमडी (IMD) द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल पूरे देश में मानसूनी सीजन के दौरान औसतन केवल 78 सेंटीमीटर बारिश होने की उम्मीद है। यह आंकड़ा सामान्य औसत वर्षा के मुकाबले लगभग 10% कम है। इससे पहले 13 अप्रैल को जारी किए गए पूर्वानुमान में 80 सेंटीमीटर बारिश की बात कही गई थी, जिसमें अब और गिरावट आई है। गौरतलब है कि साल 1971 से 2020 तक के दीर्घकालिक आंकड़ों के आधार पर भारत में मानसून के दौरान औसत बारिश का मानक 87 सेंटीमीटर निर्धारित माना जाता है, जिससे इस बार का आंकड़ा काफी पीछे छूट रहा है।

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में सूखे जैसे आसार

क्षेत्रीय पूर्वानुमान की बात करें तो मौसम विभाग ने साफ किया है कि जून के महीने में देश के मध्य और पूर्वी हिस्सों में काफी कम बादल बरसेंगे। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे प्रमुख राज्यों में सामान्य से भी काफी कम वर्षा होने की उम्मीद है। दूसरी तरफ, राहत की बात सिर्फ इतनी है कि महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के कुछ चुनिंदा इलाकों में मानसून की स्थिति सामान्य रह सकती है, जिससे वहां के स्थानीय निवासियों को कुछ हद तक राहत मिल सकती है।

मानसून के ‘कोर जोन’ में कम बारिश से कृषि क्षेत्र पर मंडराया संकट

इस साल मानसून का सबसे बुरा असर देश के ‘कोर जोन’ यानी मुख्य कृषि क्षेत्रों पर पड़ने की संभावना है। इस विशेष क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश व बिहार के कुछ हिस्से सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इन इलाकों की अधिकांश खेती पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर ही निर्भर करती है। ऐसे में कोर जोन में कम वर्षा होने का सीधा और नकारात्मक असर खरीफ की फसलों, बुवाई के रकबे और देश के कुल खाद्य उत्पादन पर पड़ेगा, जिससे देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।

कमजोर मानसून का आम जनजीवन

भारत में साल भर की कुल बारिश का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा अकेले दक्षिण-पश्चिम मानसून से प्राप्त होता है, जो सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन के लिए बेहद आवश्यक है। देश की लगभग 64% आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और मात्र 55% कृषि योग्य भूमि ही कृत्रिम सिंचाई नेटवर्क से जुड़ी है। कम बारिश के कारण खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित होगी, जिससे किसानों की लागत और खेती का जोखिम दोनों बढ़ जाएंगे।

उत्पादन घटने से बाजार में दालों, सब्जियों और अन्य आवश्यक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति कम होगी, जिसके परिणामस्वरूप आने वाले दिनों में महंगाई की मार आम आदमी की जेब पर पड़ना तय है। इसके अलावा, खेती प्रभावित होने से ग्रामीण क्षेत्रों में आय कम होगी, जिसका सीधा असर ट्रैक्टर, टू-व्हीलर की बिक्री और ग्रामीण बाजारों की मांग पर पड़ेगा। जलाशयों में पानी का स्तर घटने से बिजली की मांग बढ़ेगी और जल संकट गहराने का खतरा भी बढ़ जाएगा।

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